इसके साथ ही बहुत से नियमित देनदार तो देने की नीयत होने के बावजूद उस धन पर मिलने वाले ब्याज के लालच में उधारी नहीं चुकाते। इस तरह वे उधारी चुकाने की मियाद या क्रेडिट लिमिट को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं जबकि वह इस तरह कभी नहीं बढ़ती। सामने वाला आपको एक-दो बार मोहलत दे देगा लेकिन उसकी भी लिमिट है। बार-बार दोहराने पर वह अड़ जाएगा। तब वह मियाद को यह सोचकर कम कर देगा कि आप कुछ समय टालमटोल कर भी लेंगे तो भी पैसा समय पर वसूल हो जाएगा।
इसके उलट यदि आप समय पर पैसा चुकाते रहेंगे तो कभी भी आपको उस व्यापारी के जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा बल्कि अच्छे पे-मास्टर होने की वजह से आपकी क्रेडिट लिमिट भी समय के साथ स्वतः ही बढ़ती रहेगी। इसलिए उधारी चुकाने के लिए उधार रहो, क्योंकि उधारी आदमी को कमजोर बनाती है, तनाव देती है,उसका सुकून छीनती है। यदि आप इन सबसे बचना चाहते हैं तो जब जरूरत हो और चुका सको तभी उधार लो। और अगर चुका न सको तो कभी लो न लोन।
वैसे पैसे का लेन-देन रोजमर्रा के व्यापार का एक जरूरी हिस्सा है। यदि ऐसा नहीं होता तो व्यापार में बही खातों का अस्तित्व ही नहीं होता। लेकिन मामला चाहे लेन का हो या देन का, किसी भी खाते को लंबा नहीं खींचना चाहिए, क्योंकि लंबा खिंचने पर यह आदमी को खाता है यानी मानसिक अशांति का सबब बनता है।
इसलिए एक अच्छी बही वही होती है जो समय पर पूरी होकर बंद हो जाए, नहीं तो आपकी अधिकांश शक्ति व्यापार में कम, बही यानी अकाउंट्स के हिसाब-किताब में ज्यादा खर्च होती है। यदि आप इससे बचना चाहते हैं तो पुराने खातों को जितना जल्दी हो सके, निपटाकर नई बही लिखें।
और अंत में, आज पुष्य नक्षत्र है। आज के दिन नई बही खरीदने की परंपरा है। आज नई बही खरीदते समय आप यह प्रण जरूर करना कि इस बार चाहे पुराने खाते नई बही में आ जाएँ, लेकिन अगली बार ऐसा नहीं होने देंगे। तब आपकी बही सही अर्थों में नई होगी और आपको कभी पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गुरु-पुष्य योग में लिया गया आपका यह संकल्प जरूर पूरा होगा।
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