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जब नहीं है ईमान तो क्यों रखते हो ईमान
अब हलवाई ने अपने फायदे के लिए हकीम को पगड़ी या टोपी पहनाने की कोशिश की और बाद में उसे पता चला कि दरअसल टोपी तो वह खुद पहन चुका है। अब वो कर भी क्या सकता था। जब खुद गलत कर रहा था तो हकीम को कैसे गलत ठहराता। इसलिए हम तो यही कहेंगे कि गलत काम करना ही क्यों।

गलत काम के गलत परिणाम आज नहीं तो कल आपके सामने आएँगे ही, आते ही हैं। यदि आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है तो आज यह बात आपको समझ में आ गई होगी कि आखिर आपकी पगड़ी गई कहाँ? अरे भाई, आपकी पगड़ी को भी कोई तगड़ी-सी भैंस चर गई होगी।

दूसरी ओर यदि आपने अब तक किसी को पगड़ी नहीं दी है और देने के लिए लेकर बैठे हैं तो हम आपसे आग्रह करेंगे कि आप अपना विचार बदल लें क्योंकि पगड़ी देने के चक्कर में एक दिन आपकी ही पगड़ी उतर सकती है। इसलिए यदि हमेशा पगड़ी पहनकर यानी इज्जत के साथ रहना चाहते हो तो सही तरीके से काम करें और दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करें।

वैसे भैंस के पगड़ी खाने वाला यह फलसफा राजनीति, व्यवसाय के साथ ही जीवन के कई अन्य क्षेत्रों में भी लागू होता है, जहाँ कोई बात बनते-बनते इसलिए नहीं बन पाती या कोई समझौता होते-होते इसलिए रह जाता है क्योंकि वहाँ भी कोई दूधिया किसी हलवाई पर भारी पड़ जाता है। ऐसे में बात घूस की भले ही न हो, लेकिन कोई न कोई स्वार्थ अवश्य आड़े आ जाता है, जिसके चलते लोग जबान देकर भी पलट जाते हैं। ऐसे बेपेंदी के लोटे तात्कालिक रूप से भले ही यह सोच लें कि वे फायदे में रहे, लेकिन वास्तव में उन्हें होता नुकसान ही है, क्योंकि वे अपनी विश्वसनीयता जो खो देते हैं।

और अंत में, दीपावली मनाने के लिए उस हाकिम जैसे बहुत से लोग पगड़ी और भैंस के इंतजार में ताक लगाए बैठे हैं। हमें उम्मीद है कि अब आप अपना दिवाला निकालकर उनके लिए दिवाली मनाने का इंतजाम नहीं करेंगे।
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