गाँव की चौपाल पर ग्राम प्रधान अपने कुछ साथियों के साथ हुक्का पी रहे थे। उनके साथ उनका पोता भी बैठा हुआ था। उनको हुक्का गुड़गुड़ाते देख उसे अच्छा नहीं लग रहा था, क्योंकि उसे स्कूल में सिखाया गया था कि तंबाकू खाना और पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इससे शरीर में कई तरह की घातक बीमारियाँ लग जाती हैं।
उसने दादाजी को भी इस बारे में कई बार बताया, लेकिन वे ध्यान नहीं देते थे। इस बीच उनके खेत में एक गधा घुस आया। पोता बोला- दादाजी, वो गधा सारी फसल खा जाएगा। मैं उसे भगा आऊँ? दादा- नहीं बेटा, वह कुछ नहीं खाएगा। पोता- ऐसा कैसे हो सकता है? दादा- इसलिए कि वह तंबाकू के खेत में घुसा है और गधे तंबाकू नहीं खाते। समझे कि नहीं? पोता- जी दादाजी, मैं तो समझ गया, लेकिन आप यह बात समझकर भी नहीं समझ पाए। | दादाजी, वो गधा सारी फसल खा जाएगा। मैं उसे भगा आऊँ? दादा- नहीं बेटा, वह कुछ नहीं खाएगा। पोता- ऐसा कैसे हो सकता है? दादा- इसलिए कि वह तंबाकू के खेत में घुसा है और गधे तंबाकू नहीं खाते। समझे कि नहीं? |
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दादा- क्या मतलब है तेरा? पोता- यही कि गधा भी यह समझता है कि तंबाकू नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इससे शरीर को नुकसान होता है। यानी गधा अपना अच्छा-बुरा हम इनसानों से ज्यादा अच्छी तरह समझता है। सही समय पर की गई चोट ने दादा पर असर किया और वे हुक्का पीना भूल गए।
दोस्तो, हम जानते हैं कि सिगरेट, बीड़ी, सिगार, चिलम, हुक्का ये सभी हमारे दुश्मन हैं, लेकिन फिर भी हम इनकी लत से पीछा नहीं छुड़ा पाते। इसके दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि हमारी इच्छाशक्ति कमजोर है या फिर हम इतने लापरवाह हैं कि क्षणिक सुख के लिए अपने स्वास्थ्य को खतरे में डालने से भी नहीं चूकते।
यह मूर्खता की पराकाष्ठा नहीं तो क्या है। हम तो गधों से भी गए बीते हैं। कहते हैं कि सिगरेट के एक और आग होती है और दूसरी ओर मूर्ख का मुँह। ऐसे मूर्खों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। इनमें युवा भी शामिल हैं जिनके चेहरे से इस धूम्रपान की लत के कारण भरी जवानी में ही ग्लो या चमक चली जाती है और शरीर में बल यानी ताकत भी नहीं रहती। हम धूम्रपान से होने वाले नुकसान को जानते हुए भी इस ओर ध्यान नहीं देते। और जब देते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
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