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आदमी का काम ही बनाता है काम का आदमी
- मनीशर्म
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दूरदराज के एक गाँव में एक दर्जी रहता था। एक बार सिलाई के दौरान उसकी सूई टूट गई। दर्जी परेशान हो उठा क्योंकि नई सूई पास के गाँव में लगने वाले साप्ताहिक हाट में ही मिल सकती थी। हाट में अभी पाँच दिन बाकी थे। हाट वाले दिन दर्जी बाजार गया और इस बार सूइयों का पूरा पत्ता खरीद लाया। गाँव आकर उसने एक सूई उपयोग में ले ली और बाकी को सँभालकर रख दिया।

संयोग कुछ ऐसा रहा कि इस बार उसकी सूई लंबे समय तक चली। एक दिन उसके पास गाँव के प्रधान के लड़के के कपड़े सिलने के लिए आए। दर्जी कपड़े सिलने बैठा ही था कि उसे रखी हुई सूइयों की याद आई। उसने सोचा कि प्रधानजी के घर के कपड़े हैं, इन्हें नई सूई लगाकर सिलता हूँ।
शरद पूर्णिमा है। आज के दिन चाँदनी में सूई में धागा डालकर अपनी आँखों की रोशनी को परखा जाता है कि वह अब भी काम की है या कमजोर होकर नाकारा तो नहीं हो गई। धागा डल जाता है तो दिल को ठंडक मिलती है और शरद पूर्णिमा सार्थक हो जाती है।


यह सोचकर उसने बड़े उत्साह से सूइयों को निकाला। लेकिन सूइयाँ देखकर उसका उत्साह ठंडा पड़ गया। बहुत दिनों से रखी होने के कारण उनमें जंग लग चुका था। उसने सूई न बदलने का फैसला किया, क्योंकि उपयोग में आ रही सूई ज्यादा चमकदार थी।

दोस्तो, इसीलिए कहते हैं कि अगर आप अपने आपको लगातार उपयोगी या काम का बनाए रखना चाहते हैं तो काम करते रहें। उसमें विराम न आने दें। ऐसा करके आप समय के साथ ज्यादा अनुभवी और कार्यकुशल बनते जाएँगे और आपको हमेशा तवज्जो मिलती रहेगी, क्योंकि आप काम के आदमी जो होंगे। इस तरह एक कर्मठ व्यक्ति हर कार्य को पूरी शिद्दत से पूर्ण करके अपने लिए तरक्की के द्वार खोलता जाता है।

यदि आप भी ऐसा ही चाहते हैं, तो आपको भी काम का आदमी बनना पड़ेगा यानी काम करना पड़ेगा। यदि आपके पास काम नहीं है तो अपने वरिष्ठों से माँगना पड़ेगा। अगर आप यह सोचेंगे कि सामने वाला आगे बढ़कर आपको काम सौंपेगा तो फिर करते रहें इंतजार। और इस इंतजार के चक्कर में एक दिन आपकी क्षमताओं पर जंग लग जाएगी, तब आप किसी काम के नहीं रहेंगे और एक न एक दिन काम से बाहर हो जाएँगे।
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