- मनीष शर्मा
एक बार एक व्यक्ति गणेशजी के मंदिर में दर्शन के लिए गया। मंदिर प्रांगण में उसने एक हाथी देखा जिसे पिछले पैर में एक छोटी-सी पतली रस्सी के सहारे बाँधा गया था। यह देख वह अचरज में पड़ गया क्योंकि उस रस्सी को तो हाथी एक झटके में तोड़कर मुक्त हो सकता था।
परंतु हाथी न जाने क्यों ऐसा करता नहीं था। यह बात उस व्यक्ति की समझ में नहीं आ रही थी। उसने बड़ी ही जिज्ञासा से महावत से पूछा- महाराज! क्या आपको यह डर नहीं लगता कि हाथी इस रस्सी को तोड़कर कभी भी भाग सकता है। महावत बोला- नहीं, बिलकुल नहीं। क्योंकि यह इस रस्सी को तोड़ ही नहीं सकता।
व्यक्ति- ऐसा कैसे संभव है? महावत- दरअसल यह हाथी मेरे पास तब से है जब यह बहुत छोटा था। उस समय इसने इस रस्सी को तोड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाया क्योंकि इसमें उस वक्त इतनी शक्ति नहीं थी। तब से इसके दिमाग में यह बात बैठ गई कि इस रस्सी को तोड़ना संभव नहीं। वही बात आज भी इसके दिमाग में है जिसके चलते यह रस्सी तोड़कर भागने की कोशिश ही नहीं करता। | जरूरी है कि अपने सद्गुणों के पिछले पैरों को रस्सी से बाँधकर उसका एक सिरा अपने पास रखा जाए ताकि वे आपके काबू में रहें। तभी आप उनका भरपूर लाभ उठा पाएँगे। क्या सोचने लगे। आप भी ऐसी ही किसी रस्सी से बँधे हैं। तो फिर सोचना कैसा। |
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दोस्तो, कहते हैं हाथी की याददाश्त बहुत तगड़ी होती है। एक बार जो उसके साथ घटता है, वह उसे कभी नहीं भूलता। कितनी अच्छी बात है न ये। आखिर अच्छी याददाश्त का होना सद्गुण की श्रेणी में ही तो आता है। लेकिन इस प्रसंग में तो लगता है हाथी का यही गुण उसका अवगुण बन गया है, उसके रास्ते की रुकावट बन गया है, जिसके चलते उसके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि वह उस रस्सी को तोड़ ही नहीं सकता क्योंकि उसका शुरुआती अनुभव ही ऐसा रहा।
इसलिए समय के साथ उसने कोशिश करना ही बंद कर दिया और बँधा है एक छोटी-सी, पतली-सी रस्सी के सहारे। अपनी उस बढ़ी हुई ताकत से अनजान जो इस रस्सी की तो बात ही क्या, लोहे की मोटी साँकल को भी तोड़ सकती है। बेचारा हाथी।
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