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अपनी क्षमताओं को पहचानें
- विशाल मिश्रा

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यह काम मेरे से कहाँ होगा? कैसे करूँगा। मेरे बस का नहीं है। या क्या करना है यार सब ठीक चल रहा है। इन सब बातों से यही सिद्ध होता है कि आपने कभी अपनी क्षमताओं को पहचाना ही नहीं। उनका आकलन नहीं किया।

वाकई एक व्यक्ति के लिए बहुत मुश्किल होता है स्वयं का मूल्यांकन करना, स्वयं के बारे में जानना। जबकि दूसरों के बारे में वह ढेर सारे सकारात्मक और नकारात्मक बिंदु कुछेक सेकंड्‍स में बता सकता है।

चाहे सामने वाला उसका बहुत अच्छा मित्र हो या जिससे उसके विचार मेल नहीं भी खाते हों। इसके लिए चाहें तो कभी अपने मित्रों की मदद लें। या उनके विचारों को ईमानदारी से सुनें। आत्मविश्लेषण करें। निश्चित रूप से पाएँगे कि आपने कभी इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। आप अपने को जहाँ 5 अंक ही देते थे वहीं आप स्वयं को 80-85 अंक के तुल्य पाएँगे। और यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और न ही यह कोई गलत मूल्यांकन होगा आपका।

आखिर यह अंतर क्यों? स्वयं को जानना काफी कठिन है लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हम स्वयं को कम आँकने लग जाएँ।
  यह काम मेरे से कहाँ होगा? कैसे करूँगा। मेरे बस का नहीं है। या क्या करना है यार सब ठीक चल रहा है। इन सब बातों से यही सिद्ध होता है कि आपने कभी अपनी क्षमताओं को पहचाना ही नहीं। उनका आकलन नहीं किया।      


इससे न केवल हमारी क्षमताओं का ह्रास होता है वरन् धीरे-धीरे हम हीन भावना से ग्रस्त होने लगते हैं। आगे बढ़ने के प्रति हम जो नीरसता दिखाते हैं। उसके पीछे कुछ कारण होते हैं जैसे परिवर्तन आदमी को पसंद नहीं होता। जो चल रहा है उसे ऐसा ही चलने दें। आदमी को सबसे अच्छी स्थिति वही लगती है। यह वह आदमी है जो भीड़ के साथ बस खड़ा है। सभी एक-दूसरे को धक्का देते-देते, इधर-उधर हटाते स्वयं के लिए रास्ता बनाते चलते चले जाते हैं। यहाँ आदमी स्वयं नहीं भी चले तो अपने गंतव्य (जहाँ उसे इस भीड़ भरे स्थान से बाहर जाना है) तक पहुँच जाता है।
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