- डॉ. विजय अग्रवाल मेरे नौजवान दोस्तों, इस बात को तो आप ही महसूस कर रहे होंगे कि समय बहुत बदल गया है और कई मायनों में यह बदलाव बहुत बेहतर दिशा में हुआ है। इसमें सबसे बेहतर बदलाव है काम करने वाले लोगों की माँग का बढ़ना। साथ ही समाज में उनकी कद्र का होना भी, लेकिन हमें इसे थोड़ा अलग तरीके से समझना पड़ेगा, क्योंकि अभी भी आमतौर पर कहा तो यही जाता है कि हमारे यहाँ रोजगार की बहुत कमी है, लेकिन क्या सचमुच में ऐसा है?
कुछ ही दिनों पहले हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने कहा था कि हमारे यहाँ कार्यकुशल लोगों की बहुत कमी है। उनके कार्य कार्यकुशल शब्द पर गौर कीजिए। हमारे यहाँ लोगों की कमी नहीं है। आबादी के मामले में तो हम दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं, लेकिन कार्यकुशल लोगों की निश्चित रूप से बेहद कमी है। जब मैं कार्यकुशल लोगों की कमी की बात कर रहा हूँ तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि डॉक्टर, इंजीनियर्स की कमी है या वकील और प्रबंधकों की कमी है। इस कार्यकुशल शब्द को बहुत व्यापक स्तर पर सोचा और समझा जाना चाहिए।
किसी भी काम को करने का अपना एक वैज्ञानिक तरीका होता है। यहाँ तक कि जब हम चलते और उठते-बैठते हैं तब भी चलने और उठने-बैठने का एक वैज्ञानिक तरीका अपना काम कर रहा होता है। हमारे लिए उस समय ठीक से चल पाना मुश्किल हो जाएगा, जब हम चलते समयअपने दोनों हाथ एकसाथ आगे की ओर या एकसाथ पीछे की ओर ले जाएँ। इसका वैज्ञानिक तरीका यही है कि जब एक हाथ आगे की ओर जाए तो दूसरा हाथ पीछे की ओर। | | इस बात को तो आप ही महसूस कर रहे होंगे कि समय बहुत बदल गया है और कई मायनों में यह बदलाव बहुत बेहतर दिशा में हुआ है। इसमें सबसे बेहतर बदलाव है काम करने वाले लोगों की माँग का बढ़ना। साथ ही समाज में उनकी कद्र का होना भी। |
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जिंदगी जीने के बहुत से तौर-तरीके तो हम देखकर और समझकर सीख जाते हैं और ये काफी कुछ वैज्ञानिक भी होते हैं। काम करने के भी बहुत से तौर-तरीके हम देखकर ही सीखते हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि वे बहुत वैज्ञानिक नहीं होते। अगर कोई तरीका कई पीढ़ियों से गलत होता आ रहा है तो हम भी उसे गलत तरीके से करने लगते हैं और कुछ समय बाद वहीं तरीका सही लगने लगता है। कम से कम मुझे तो ऐसा लगता ही है कि हमारे काम करने के बहुत से तरीके गलत हो चुके हैं, किंतु उन्हें हम सही मान रहे हैं।
मुझे ऐसा लगता है कि अब, जबकि शिक्षा को सीधे-सीधे व्यवसाय से जोड़ने की बात हो रही है और इसके लिए अनेक तरह के प्रशिक्षण संस्थान खुल रहे हैं, इस पर विस्तार से सोचा जाना चाहिए। जाहिर है कि इस तरह से सोचे जाने का काम उन निजी उद्यमियों को करना चाहिए,जिनके लिए यह आसान है और उनके अपने रोजगार का जरिया भी है।
आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रबंधन के नए-नए संस्थान खुलते जा रहे हैं। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इनकी अपनी समस्याएँ हैं। समस्याएँ ये हैं कि जहाँ इन संस्थानों में एक अच्छा विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकता है, वहीं उसके पास पढ़ाई करने के लिए एक अच्छा आर्थिक आधार भी होना चाहिए।
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