नई दिल्ली (भाषा), बुधवार, 4 नवंबर 2009( 00:16 IST )
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वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मंगलवार को कहा कि मुद्रास्फीति को लेकर तत्काल बड़ी चिंता की जरूरत नहीं है और जब तक अर्थव्यवस्था मंदी के प्रभावों से पूरी तरह उबर नहीं जाती, राजकोषीय प्रोत्साहन उपाय जारी रहेंगे।
उन्होंने आर्थिक संपादकों के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि इस समय मैं यही कहूँगा कि राजकोषीय प्रोत्साहन जारी रहेगा ताकि अर्थव्यवस्था को इसका पूरा फायदा मिल सके।
मुखर्जी ने प्रोत्साहन पैकेज जारी रखने की यह टिप्पणी ऐसे समय की है, जब कुछ दिन पहले 27 अक्तूबर को भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति की दूसरी तिमाही की समीक्षा में ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के बावजूद ऋण को महँगा करने के कुछ उपाय किए और रिजर्व बैंक के गवर्नर ने उसे प्रोत्साहन पैकेज से हटने का पहला कदम बताया था।
वित्त मंत्री ने कहा कि राजकोषीय संतुलन की ओर लौटना बहुत जरूरी है और अर्थव्यवस्था में जैसे ही सुधार हुआ, उस दिशा में कदम उठाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि सरकार गैर योजना व्यय में कटौती के कदमों पर नजदीकी निगाह रखे हुए है। विशेष तौर पर उसकी नजर पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी पर है। चालू वित्त वर्ष में अकेले उर्वरक सब्सिडी 55, 000 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है।
मुखर्जी ने कहा कि विनिवेश के जरिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने से सरकार को राजकोषीय स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि राजकोषीय घाटा 2008-09 के दौरान चढ़ना शुरू हुआ और 2009-10 में भी वह कई प्रोत्साहन पैकेजों के साए में है।
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि दूसरी चुनौती सरकार में नई उर्जा फूँकना और शासन व्यवस्था को मजबूत करना है ताकि लोगों को सार्वजनिक सेवाएँ, सुरक्षा और कानून व्यवस्था देने वाली मशीनरी अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनाई जा सके। उन्होंने कहा कि तीसरी चुनौती समावेशी विकास को और व्यापक बनाने की है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि सभी को खाना, स्वास्थ्य और शिक्षा मिले।
वित्त मंत्री ने कहा कि हाल के महीनों में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। 2009-10 की पहली तिमाही में विकास दर 6.1 प्रतिशत रही, जबकि इससे पहले की दो तिमाहियों में यह 5. 8 प्रतिशत थी।
उन्होंने कहा कि औद्योगिक वृद्धि दर भी जून-जुलाई में काफी सुधरी है और इन महीनों में औद्योगिक उत्पादन इन्डेक्स जून और जुलाई में क्रमश: 8. 2 और 7. 2 प्रतिशत पर रहा। अगस्त 2009 में औद्योगिक वृद्धि दर 10. 4 प्रतिशत रही।
मुखर्जी ने कहा कि इससे बड़ी बात यह है कि पिछले साल जो विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पूँजी निकाल रहे थे, वे फिर बाजार में लौट आए हैं और पिछले पाँच महीनों में उनका निवेश बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में ऋण के लिए संसाधनों की कमी नहीं है और मुद्रास्फीति भी बड़ी चिंता का विषय नहीं है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में औद्योगिक वृद्धि दर में तेजी दिखने के बावजूद सितंबर 2009 में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर नरमी के संकेत दिखे हैं। इसके साथ साथ विश्व अर्थव्यवस्था के मंदी से उबरने की प्रक्रिया को लेकर भी अनिश्चितता है।
वित्त मंत्री ने कहा कि औद्योगिक वृद्धि दर भी जून-जुलाई में काफी सुधरी है और इन महीनों में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक जून और जुलाई में क्रमश: 8 . 2 और 7 . 2 प्रतिशत पर रहा। अगस्त 2009 में औद्योगिक वृद्धि दर 10. 4 प्रतिशत रही।
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि इससे बड़ी बात यह है कि पिछले साल जो विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पूँजी निकाल रहे थे, वे फिर बाजार में लौट आए हैं और पिछले पाँच महीनों में उनका निवेश बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में ऋण के लिए संसाधनों की कमी नहीं है और मुद्रास्फीति भी बड़ी चिंता का विषय नहीं है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में औद्योगिक वृद्धि दर में तेजी दिखने के बावजूद सितंबर 2009 में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर नरमी के संकेत दिखे हैं। इसके साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था के मंदी से उबरने की प्रक्रिया को लेकर भी अनिश्चितता है इसलिए हम लोग अपनी सतर्कता को ढीला नहीं छोड़ सकते।
मुखर्जी ने कहा कि नौ प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर हासिल करना विश्व अर्थव्यवस्था के उबरने पर निर्भर करती है क्योंकि 60 प्रतिशत निर्यात विकसित देशों को होता है और हम तत्काल उन बाजारों का विकल्प नहीं निकाल सकते।