वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने 25 साल बाद सोमवार को एक बार फिर देश का पूर्ण बजट पेश करते हुए शुरुआत में जहाँ भारतीय इतिहास के अब तक के सबसे शक्तिशाली रणनीतिकार और अर्थशास्त्री कौटिल्य के जरिये वैश्विक आर्थिक मंदी से निपटने का संकल्प जताया, वहीं समाज के सभी वर्गों के उत्थान के लिए महात्मा गाँधी को याद करना भी वे नहीं भूले। अपने बजट भाषण के प्रारंभ में मुखर्जी ने वैश्विक आर्थिक मंदी से जूझती अर्थव्यवस्था को पार लगाने का संकल्प करते हुए कौटिल्य की इस उक्ति को उद्धृत किया- ''देश की समृद्धि के हित में राजा को आपदाओं की संभावना का अंदाज लगाने में मनोयोगपूर्ण होना होगा। उनके घटित होने से पहले उन्हें टालने का प्रयास करना होगा। जो घटित हो गई हैं, उनसे निपटना होगा। आर्थिक क्रियाकलाप के सभी अवरोधों को दूर करना होगा और राज्य में होने वाली राजस्व हानि को रोकना होगा।''
उन्होंने कहा मैं कौटिल्य की सलाह मानकर भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक संकट के नकारात्मक प्रभाव के समाप्त होते ही शीघ्र राजकोषीय घाटे के एफआरबीएम लक्ष्य पुन: प्राप्त करने का इरादा करता हूँ। एक अन्य स्थान पर मुखर्जी ने कौटिल्य का जिक्र करते हुए कहा ‘‘जिस प्रकार कोई व्यक्ति बगीचे से पके फलों को तोड़ता है, उसी प्रकार एक राजा तभी राजस्व संग्रह करता है, जब वह देय होता है।
''जिस प्रकार कोई बिना पके फलों को एकत्र नहीं करता, उसी प्रकार राजा देय न हुए धन को लेने से बचेगा, क्योंकि ऐसा न करने पर लोग क्रोधित होंगे और राजस्व के स्रोत को ही नष्ट कर देंगे। ’’
अंत में उन्होंने आगामी पाँच वर्षों को मुश्किल बताते हुए अनिश्चितताओं का सफलता से सामना करने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को याद किया।
उन्होंने कहा गाँधीजी ने कहा था कि लोकतंत्र लोगों के विभिन्न वर्षों’ के समग्र भौतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक संसाधनों को जुटाने की कला और विज्ञान है, जिसमें सभी की सामान्य भलाई अंतर्निहित है।’’
उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से वही कार्य है, जो हमें पूरा करना है। हमें अपने पूरे दिल से पूरी बुद्धिमत्ता से और पूरी इच्छाशक्ति से अपने सपनों के भारत का निर्माण करने के लिए सभी विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करना और सभी अवरोधों को दूर करना है। |