- विट्ठल नागर
बढ़ते मूल्यों एवं मुद्रास्फीति को नाथने के लिए लगता है, भारतीय रिजर्व बैंक ने आर-पार की लड़ाई ठान ली है और 24 जून को ऐसे काम उठाए हैं, जो उद्योग, व्यापार एवं उपभोक्ता सभी के लिए कष्टप्रद साबित हो सकते हैं। हद्द पार करने जैसे उन कदमों पर केंद्र सरकार की भी रजामंदी है। उद्योग व व्यापार तो तीन-चार माह में बचत करने व लागत घटाने वाले कदमों के सहारे स्थिति निपट लेंगे।
वैसे भी उनके पास मूल्यवृद्धि का सहारा है ही, किंतु आवास हेतु अथवा कार, | | जब बैंकों के पास आधिक्य की रकम अधिक होती है तो वे रिजर्व बैंक को अल्पकाल के कर्ज देती है, जिसे रिवर्स रेपो कहा जाता है। 24 जून को रिजर्व बैंके ने रेपो दर बढ़ाया है- अर्थात अब बैंकों की रिजर्व बैंक से अल्पकाल का कर्ज महँगा मिलेगा |
| |
मोटरसाइकल, टीवी, एसी के लिए बैंकों से कर्ज लेने वालों के सामने जो परेशानी आएगी, उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकेगी। उन्हें तो वास्तव में परिवार का पेट काटकर कर्ज की बढ़ी हुई वार्षिक किस्तें चुकाना पड़ेंगी।
भारतीय रिजर्व बैंक को लगता है कि विश्व बाजार में खनिज तेल, खाद्यान्न एवं धातुओं के भाव घटने वाले नहीं हैं एवं खनिज तेल के भाव लंबी अवधि तक तेजतर्रार बने रह सकते हैं। इससे भारत में भी खाद्यान्न व धातुओं के भाव ऊँचे बने रहेंगे, क्योंकि देश को इन वस्तुओं का आयात करना पड़ता है। जहाँ तक खनिज तेल व पेट्रोलियम उत्पादों का प्रश्न है- भारत में इनके भाव अभी भी कम हैं। पेट्रोलियम उत्पादों पर अभी भी सरकार करीब 70 प्रतिशत सबसिडी दे रही है।
अगर विश्व में उनके भाव बढ़े तो सरकार को भी पेट्रोल-डीजल, गैस आदि के भाव बढ़ाने पड़ेंगे। अर्थात देश में मूल्य वृद्धि व मुद्रास्फीति की स्थिति में और अधिक वृद्धि की आशंका है, जबकि पहले से ही देश में मुद्रास्फीति की दर 11 प्रतिशत की सीमा को पार कर गई है। इसी स्थिति को भाँपकर रिजर्व बैंक ने सख्त कदमों का सहारा लिया है एवं बैंक सीआरआर व रेपो दर में आधा-आधा प्रतिशत की वृद्धि कर दी है। यह वृद्धि व्यावसायिक बैंकों पर बहुत भारी पड़ेगी। इसीलिए उन्होंने कर्जों एवं जमा रकमों पर ब्याज दर बढ़ाना शुरू कर दिया है।
वर्ष 2006 एवं 2007 में अर्थव्यवस्था को गर्म आग बनने से रोकने के लिए ब्याज दर, सीआरआर व रेपो दर का सहारा लिया गया था और अब मुद्रास्फीति से निपटने के लिए सतत रूप से सीआरआर व रेपो दर में वृद्धि का सहारा लिया जा रहा है। 17 अप्रैल को रेपो दर में आधे प्रतिशत की, अप्रैल 29 को चौथाई प्रतिशत और अब 24 जून को आधे प्रतिशत की वृद्धि पुनः की गई है।
इसी तरह सीआरआर दर में 26 अप्रैल, 10 मई, 24 मई फिर जून 11 और अब 24 जून को पुनः वृद्धि की गई है। 24 जून को हुई आधा प्रतिशत की वृद्धि के तहत बैंकों की करीब 16000 करोड़ रु. की जमा खातों की रकमें रिजर्व बैंक के खाते में अनिश्चित अवधि तक जमा रहेंगी एवं बैंकें उस रकम को कर्ज में नहीं बाँट सकेंगी। अर्थात उन्हें इतना कोष पुनः ऊँचे ब्याज पर जुटाना पड़ेगा। अगर वे महँगे भाव पर कर्ज जुटाएगी तो दिए जाने वाले कर्ज भी महँगे ही होंगे।
सीआरआर दर इसलिए बढ़ाई, क्योंकि ब्रॉडमनी या एम 3 (रुपए का फैलाव) बढ़कर 21.5 प्रतिशत हो गया है, जो रिजर्व बैंक की राय में - इसमें 4 प्रतिशत से अधिक की कमी आना चाहिए। रुपए के फैलाव को सिकोड़ने के लिए ही बारबार सीआरआर दर बढ़ाई जा रही है। इसी तरह अर्थव्यवस्था में बैंकों द्वारा दिए जाने वाले कर्जों का आकार बढ़ रहा है, भारतीय रिजर्व बैंक चाहता है कि कर्जों का आकार 20 प्रतिशत से अधिक न हो, जबकि अभी यह 25.5 प्रतिशत है।
|