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रियलटी में 20 अरब डॉलर का विदेशी निवेश
सबप्राइम संकट, इस्पात, सीमेंट एवं जमीन की आसमान छूती कीमतों और बाजार में पूँजी की कम उपलब्धता ने देश में बूम कर रहे रियलटी क्षेत्र के निवेशकों और डेवलपरों को मुश्किल में डाल दिया है और उससे प्रापर्टी की कीमतें 15 से 50 प्रतिशत घटने की संभावना व्यक्त की जाने लगी है।

सबप्राइम संकट के प्रभाव और राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती महँगाई से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के नकद आरक्षित अनुपात बढ़ा देने से बैंक आवासीय ऋण देने से कतराने लगे हैं। भारतीय रियलटी क्षेत्र में 30 करोड़ डॉलर का निवेश करने वाली कंपनी रेडफोर्ट कैपिटल के प्रबंध निदेशक पैरी सिंह का कहना है कि बहुत बुरी स्थिति है। डेवलपरों के लिए पूँजी बाजार बंद होने लगे हैं जो कभी हमेशा के लिए समझे जाते थे। बैंकों ने अपने हाथ खींच लिए हैं। छोटे कारोबारियों के लिए कोई ऋण उपलब्ध नहीं है।

हालाँकि बड़ी कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर पूँजी जुटा रही है। भूमि खरीदने के लिए बैंकों ने ऋण देने से मना कर दिया है और सीआरआर बढ़ा देने से बाजार में पूँजी घट गई है। अन्य ऋणों के लिए बैंक 13 प्रतिशत से 14 प्रतिशत तक का ब्याज वसूल कर रहे हैं। रिजर्व बैंक के हाल में सीआरआर में पौन प्रतिशत बढ़ोतरी से बैंकिंग तंत्र से 27 हजार 500 करोड़ रुपए की तरलता और कम हो गई हैं।

बाजार में तेजी से बदलती परिस्थितियों ने डेवलपरों को जमीन पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। जानकारों का कहना है कि रियलटी क्षेत्र वास्तविक स्वरूप ग्रहण कर रहा है और धीरे-धीरे माँग और आपूर्ति से नियंत्रित हो रहा है। उनका कहना कि आने वाले समय में प्रापर्टी के दाम कुछ स्थानों पर 15 से 50 प्रतिशत गिर सकते हैं। हालाँकि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर, कोलकाता, चेन्नई जैसे शहरों में व्यावसायिक संपत्तियों की कीमतों में गिरावट की संभावना नहीं है।

वर्ष 2005 से सरकार ने निर्माण उद्योग से विदेशी निवेश के लिए कायदे-कानूनों में ढील देनी शुरू की और स्थानीय डेवलपरों को विदेशी संस्थानों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने की छूट दी। इसके साथ ही देश में कई विदेशी संस्थानों ने प्रथम और द्वितीय श्रेणी के शहरों में स्थानीय डेवलपरों के जरिए रियलटी में पैर जमाने के प्रयास किए।

सरकार ने प्रोत्साहन के कारण पिछले तीन वर्ष में देश के रियलटी क्षेत्र में 20 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ है। हालाँकि इसमें वास्तविक अर्थों में केवल दो अरब डॉलर ही खर्च हो पाया है। बाकी का निवेश संशय की स्थिति में पड़ा हुआ है।

इस्पात और सीमेंट के दाम लगातार ऊँचे होते जा रहे हैं। पिछले छह महीनों के दौरान इनके दामों में 25 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। डेवलपरों की लागत बढ़ रही है जबकि ग्राहक पूर्व में किए गए सौदों से अधिक राशि देने को तैयार नहीं है। नए ग्राहक तो बाजार में नहीं के बराबर हैं।

रियलटी के रिटेल कारोबार के जानकारों का कहना है कि बाजार में मूल ग्राहक नहीं है और जो भी सौदे हो रहे हैं उनका मकसद निवेश करना या अदला-बदली करना है। देश के प्रमुख शहरों में निवेश करने वाले लोग आवास के लिहाज से नहीं बल्कि भविष्य में बेहतर वापसी की उम्मीद में मकान, फ्लैट या जमीन खरीद रहे हैं। उनका मानना है कि बैंकों के आवास ऋण महँगा कर देने से रियलटी के खुदरा कारोबार पर सीधा असर पड़ेगा।

एक अध्ययन के मुताबिक अगले दो वर्षों में पाँच हजार डॉलर प्रति वर्ष अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या दुगुनी होकर दो करोड़ हो जाने की संभावना है। इसके कारण मकानों की माँग में तजी से इजाफा होगा। जानकारों का कहना है कि अभी तक कोई डेवलपर इस वर्ग को लक्ष्य करके परियोजना लेकर नहीं आया हैं। मुंबई के हीरानंदानी ग्रुप का कहना है कि इस वर्ग में बेदह संभावनाएँ हैं लेकिन किसी ने इस खजाने को नहीं छुआ।

फिलीपींस के डेवलपर अयाला लैंड का एशिया प्रापर्टी फंड का कारोबार देखने वाली आर्क कैपिटल मैनेजमेंट से जुड़े रिचर्ड यू ने कहा कि पिछले छह महीने में रियलटी के कारोबारी ज्यादा व्यावहारिक हो गए हैं क्योंकि उनका पूँजी बाजार सिकुड़ रहा है।

दुबई का एम्मार एमजीएफ लैंड का जनवरी में 1.6 अरब डॉलर का प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) वापस होना रियलटी बाजार के लिए पहला झटका था। इसके पुणे की वासकोन इंजीनियर्स लिमिटेड ने आना आईपीओ अनिश्चित काल के लिए टाल दिया। यही हाल यूनीटेक लिमिटेड के 1.5 अरब डॉलर के आईपीओ का भी हुआ।

श्री ट्रेड कंसल्टेंट के विश्लेषक रिश तेज का कहना है कि रियलटी के लिए एम्मार एमजीएफ का आईपीओ वापस होना तगड़ा झटका था। इसके बाद रियलटी के लिए निजी क्षेत्र में पूँजी जुटाना मुश्किल हो गया और कोई भी कंपनी आईपीओ के जरिए पूँजी बाजार में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।

रियलटी क्षेत्र की कंपनियाँ इस संकट से निकलने के लिए ऐसी कंपनियों के साथ गठजोड़ कर रही है जो इस क्षेत्र की नहीं हैं। ये सौदे भी निजी लेकिन बड़े स्तर पर हो रहे हैं। हाल में पार्श्वनाथ डेवलपर्स लिमिटेड ने मुंबई में अपनी एक परियोजना की 30 प्रतिशत हिस्सेदारी यूरोनेक्स्ट में सूचीबद्ध यात्रा कैपिटल तथा सफरोन इंडिया रियल एस्टेट को चार करोड़ 60 लाख डॉलर में बेच दी।

इसी तरह ड्यूश बैंक की कंपनी आरआरईईएफ ने असूचीबद्ध कंपनी गोल्डन गेट में हिस्सेदारी ली है। मोर्गन स्टेनले ने तीन डेवलपरों के साथ करार किया है। सिटी ग्रुप बंगलुरु की नीतेश एस्टेट के साथ एक परियोजना पर काम कर रहा है।

रियलटी के भविष्य को लेकर बनी अनिश्चय की स्थिति को देखते हुए महिंद्रा लाइफस्पेस डेवलपर्स ने एक टाउनशिप परियोजना में आर्क कैपिटल ग्रुप का दामन थामा है जबकि महिंद्रा का दावा है कि उसके पास 12 करोड़ 50 लाख डॉलर नगद होने के कारण कंपनी को पूँजी का संकट नहीं है और न ही उसे पूँजी की जरूरत है।

मंहिद्रा के कार्यकारी निदेशक अरुण नंदा का कहना है कि आगामी वर्ष रियलटी में निवेश करना फायदे का सौदा होगा। हाल की कारोबारी मंदी के संबंध में उनका कहना है कि ये थोड़े समय के लिए होगी। देश की अर्थव्यवस्था आठ से साढ़े आठ प्रतिशत की दर से विकास कर रही है इसलिए जल्दी ही भारी मात्रा में कार्यालयों, मकानों और दुकानों की जरूरत होगी।

रेडफोर्ट कैपिटल की एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक रियलटी बाजार लोगों की माँग पूरी नहीं कर रहा है। ज्यादातर डेवलपर जमीन के लिए ऊँची कीमत चुका रहे हैं। गलत उत्पाद बना रहे हैं और उसके संबंध में कोई अनुसंधान भी नहीं किया जा रहा है।
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