विश्व भर में फैली मंदी को देखते हुए चालू वित्त वर्ष में देश से 200 अरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य को हासिल कर पाना मुश्किल हो सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक मंदी से माँग में कमी को देखते हुए 2008-09 में निर्यातकों के समक्ष कड़ी चुनौतियाँ हैं और परिस्थितियों को देखते हुए इसे हासिल कर पाना काफी मुश्किल नजर आ रहा है।
गौरतलब है कि समाप्त हुए वित्त वर्ष में निर्यात में 23 प्रतिशत की अच्छी बढ़ोतरी के बावजूद 160 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सका। लक्ष्य की तुलना में 155 अरब 50 करोड़ डॉलर का निर्यात किया गया।
विश्व व्यापार संगठन ने पिछले सप्ताह कहा था कि 2008 में विश्व व्यापार की वृद्धि दर छह वर्ष के न्यूनतम स्तर पर रहने का अनुमान है। हालाँकि संगठन का कहना है कि वित्तीय बाजारों की उठापटक और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की मंदी से अब तक कोई खास असर नहीं पड़ा है।
सरकार ने 200 अरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य को हासिल करने के लिए ड्यूहा ड्राबैक योजना और ब्याज सहायता की सुविधा को एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। इसके अलावा सब्जियों, खेल सामानों, खिलौनों और कंप्यूटर हार्डवेयर के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नई रियायतें दी जाएँगी। इस वर्ष की विदेश व्यापार नीति में फोक्स मार्केट्स और फोक्स प्रोडक्ट्स योजनाओं को भी लचीला बनाया गया है। समाप्त हुए वित्त वर्ष में रुपए की मजबूती को देखते हुए सरकार ने निर्यातकों को राहत देने के लिए कर वापसी की दरों को बढ़ाने के साथ ही बैंक ऋणों पर सबसिडी की पेशकश की थी। वित्त वर्ष के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपए में आई करीब 12 प्रतिशत की मजबूती ने निर्यात को प्रभावित किया था। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 15 प्रतिशत हिस्सा है।
वर्तमान में देश का विश्व व्यापार में करीब एक प्रतिशत हिस्सा है और सरकार ने 2020 तक इसे पाँच प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा हुआ है। विश्लेषकों के मुताबिक निर्यात लक्ष्य हासिल नहीं किए जाने से बढ़ता व्यापार घाटा सरकार के लिए चिंता का विषय नहीं होगा क्योंकि देश के पास 300 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा का भंडार है जिससे इसकी भरपाई आसानी से की जा सकेगी।
बीते वित्त वर्ष के दौरान निर्यात लक्ष्य हासिल नहीं किए जाने और तेल आयात पर खर्च की जाने वाली रकम में बढ़ोतरी से आयात में जोरदार बढ़ोतरी हुई। वर्ष के दौरान तेल आयात में 35.28 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह पहले के 56.94 अरब डॉलर से बढ़कर 77.03 अरब डॉलर पर पहुँच गया। बीते वित्त वर्ष में कुल आयात 235 अरब 91 डॉलर का रहा। आयात बढ़ने से 2007-08 में व्यापार घाटा पहले के 59.32 प्रतिशत से बढ़कर 80.39 अरब रुपए पर पहुँच गया।
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