मुद्रास्फीति की दर का बढ़ना बरकरार है और 19 अप्रैल को समाप्त सप्ताह के दौरान 42 महीने के उच्चतम स्तर 7.57 फीसदी पर पहुँच गई।
मुद्रास्फीति में यह बढ़ोतरी सब्जियों, खाद्य पदार्थों, इस्पात और कुछ ईंधन उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। सरकार ने जहाँ मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए 6300 करोड़ रुपए के राजस्व का बलिदान करते हुए कई कदम उठाए, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक ने नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) में बढ़ोतरी की, जिसके जरिए बैंकिंग प्रणाली से 27 हजार 500 करोड़ रुपए जुटाए जाएँगे।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी ने कहा कि सरकार और आरबीआई द्वारा उठाए गए कदमों से भविष्य में मुद्रास्फीति के दबाव कम होंगे और मुद्रास्फीति की दर 5.5 फीसदी के नीचे आ सकती है।
चावल और दूध की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ, जबकि सब्जियाँ 0.3 फीसदी कम हुईं। समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान चाय की कीमतों में 17 फीसदी और बकरे के माँस में दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि इस्पात के उत्पाद 51 फीसदी महँगे हुए।
पिछले साल की समान अवधि में मुद्रास्फीति की दर 6.07 फीसदी थी, जो छह नवंबर 2004 को समाप्त सप्ताह के दौरान 7.76 फीसदी के स्तर पर पहुँच गई थी।
वैश्विक स्तर पर जिंसों और तेल की कीमतों की स्थिति के मद्देनजर रिजर्व बैंक ने चालू वित्तवर्ष के लिए 5.5 फीसदी की मुद्रास्फीति की दर को सहनीय स्तर घोषित किया है, जबकि पिछले साल यह स्तर करीब पाँच फीसदी था।
सरकार पर हमले तेज : महँगाई की दर के बढ़कर 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँचने के साथ ही सरकार पर चारों ओर से हमले बढ़ गए हैं और विपक्षी पार्टी भाजपा ने आज माँग की कि कीमतों में वृद्धि पर काबू नहीं पा सकती तो संप्रग सरकार को गद्दी छोड़ देनी चाहिए।
दूसरी ओर सरकार का समर्थन कर रही वामपंथी पार्टियों ने महँगाई पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए 'वैश्विक घटना' के सिद्धांत को खारिज कर दिया।
भाजपा ने महँगाई के खिलाफ एक दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया जिससे कुछ राज्यों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। हालाँकि राजग के घटकों ने अलग रास्ता अपनाया।
विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने दावा किया कि संप्रग बढ़ती महँगाई की आशंका से लोकसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर में करवा सकती है, वहीं पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि अगर संप्रग सरकार महँगाई पर काबू नहीं पा सकती है, तो उसे गद्दी छोड़ देनी चाहिए।
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