बढ़ती लागत का दबाव झेल रही घरेलू कंपनियाँ अपने माल की कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं जिससे अप्रैल-सितंबर 08 की छमाही में महँगाई की मार और कड़ी होने का खतरा बढ़ा है। यह बात भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल फिक्की के ताजा व्यावसायिक मनोबल सर्वेक्षण से सामने आई है।
मार्च में कराए गए इस सर्वेक्षण की आज जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे माल और उत्पादन के अन्य संसाधनों की बढ़ती लागत के कारण विभिन्न क्षेत्रों की कंपनियों के लिए कारोबार में मुश्किलें बढ़ गई हैं। सर्वेक्षण के अनुसार लागत का दबाव बढ़ने के कारण कारण 31 प्रतिशत कंपनियाँ अगले छह माह के दौरान कीमतें बढ़ाने की योजना बना रही हैं। इनमें भारी उद्योग क्षेत्र की कंपनियाँ भी शामिल हैं। छह माह पूर्व केवल 15 प्रतिशत कंपनियों ने कहा था कि वे कीमत बढ़ाने की योजना बना रही है।
यह बदलाव तब आया है जबकि वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने महँगाई का दबाव कम करने के लिए इस बार बजट में उत्पाद शुल्क में दो प्रतिशत की कमी कर दी है ताकि कारखानों में बनने वाले सामानों की कीमतें कम हो सकें।
महँगाई के दवाब की प्रमुख सूचक थोक मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 12 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में 7.14 प्रतिशत से बढ़ कर 7.33 प्रतिशत हो गई। पिछले वर्ष इसी दौरान मुद्रास्फीति 6.34 प्रतिशत थी। मुद्रास्फीति का दबाव एक बड़ा मुद्दा बन गया है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह ने कल वाम दलों के साथ एक बैठक के बाद जारी बयान में राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे महँगाई पर राजनीति न करें और इसका भय न खड़ा करें क्योंकि इससे जमाखोरी और सट्टा बाजारी बढ़ती है।
सर्वेक्षण के निष्कर्षों के बारे में फिक्की की विज्ञप्ति में कहा गया है कि 2008-09 के बजट में उद्योगों को दो उत्पाद शुल्क में दो प्रतिशत की सामान्य रियायत का लाभ भी लागत के दबाव में काफूर हो सकता है। ज्यादातर कंपनियों का कहना है कि उत्पाद शुल्क की रियायत की बदौलत अपनी चीजों के दाम को थोड़े समय तक ही थाम सकती हैं।
फिक्की के इस सर्वेक्षण में एक करोड़ रुपए से 50 हजार करोड़ रुपए तक का सालाना कारोबार करने वाली 392 कंपनियों से व्यावसाय के वातावरण के बारें में उनकी राय ली गई थी। इनमें कपड़ा, चमड़ा से लेकर लोहा, इस्पात और दवा से लेकर वाहन तक बनाने वाली कंपनियाँ हैं।
फिक्की की विज्ञप्ति के अनुसार ब्याज की महँगी दरें, रुपए की विनिमय दर में तेजी और कच्चे माल की लागत और मुद्रास्फीति के दवाब के कारण उनका विश्वास डिगा हुआ है। इस सर्वेक्षण में 50 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि पिछले छह माह में व्यावसायिक वातावरण खराब हुआ है। छह माह पूर्व इस तरह की बात करने वाली कंपनियों का हिस्सा 19 प्रतिशत था। 38 प्रतिशत ने कहा कि अगले छह माह तक यही माहौल रहेगा जबकि 33 प्रतिशत ने कहा कि माहौल और खराब हो सकता है। पर 54 प्रतिशत अब भी निवेश बढ़ने की उम्मीद रखती है जो फिक्की की राय में आशा की लौ के बने रहने का पर्याय है।
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