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लाभ व उत्पादों में कमी संभव
चौथी तिमाही के आँकड़ों की प्रतीक्षा
- विट्ठल नागर

वर्ष 2006-07 की तुलना में 2007-08 की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च) में कंपनियों के मुनाफे एवं कारोबार में ही नहीं वरन औद्योगिक उत्पाद के सूचकांक में भी गिरावट की स्थिति संभव है। वास्तव में गिरावट का यह क्रम वर्ष 2007-08 की दूसरी तिमाही से ही शुरू होने लगा था। हालाँकि तब आँकड़े अधिक निराशा व्यक्त करने वाले नहीं थे।

चालू वित्तीय वर्ष (2007-08) की द्वितीय तिमाही (जुलाई से सितंबर) 3200 से अधिक कंपनियों के विक्रय में 14.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, जबकि उसके पिछले वर्ष की इसी तिमाही में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। इसी तरह कंपनियों के मुनाफे में वृद्धि का प्रतिशत भी 32 प्रतिशत से घटकर 18.5 प्रतिशत रह गया था।

तब से (सितंबर 2007 से) अब तक (31 मार्च 2008 तक) अनेक नकारात्मक प्रभाव उभरे हैं, जिससे चालू वित्तीय वर्ष की चौथी तिमाही की आर्थिक वृद्धि दर को ठेस लग सकती है। यह भी सही है कि कुछ क्षेत्र की कंपनियों के चौथी तिमाही के परिणाम एवं उनके कारोबार की स्थिति संतोषजनक रह सकती है, जिनमें आईटी, टेलीकॉम भारी इंजीनियरिंग, इस्पात सीमेंट एवं पूँजीगत माल क्षेत्र की कंपनियाँ मुख्य हैं।

आईटी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के राजस्व में (चौथी तिमाही में) 6 से 7 प्रतिशत की वृद्धि संभव है। किंतु चौथी तिमाही के पश्चात उनके लिए वैश्विक परिदृश्य अधिक आकर्षक नहीं रहेगा। इस्पात व सीमेंट क्षेत्र की कंपनियों के सामने भी लाभ के मार्जिन में कमी की आशंका है। ऐसा ही हाल अलौह धातुओं से संबद्ध उद्योगों का भी है।

देश में एक और मुद्रागत फैलाव के विरुद्ध सख्त नीतियाँ लागू हैं, डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत बना हुआ है तो दूसरी ओर मुद्रास्फीति सहनशीलता की क्षमता को लाँघ रही है, वैश्विक वित्तीय बाजार में हो रही भारी उथल-पुथल से देश की बैंकों व कंपनियों को संभावित घाटा सहन करना पड़ सकता है।

इन तमाम कारणों से, विश्लेषकों की राय में, वर्ष 2007-08 की चौथी तिमाही में कई कंपनियों की अर्जन व कामकाज की स्थिति अधिक उत्साहप्रद नहीं लगती। वैसे भी इस तिमाही में निर्माता (मैन्युफेक्चरिंग) एवं पूँजीगत माल क्षेत्र की कंपनियों का कामकाज ऊँची ब्याज दर एवं महँगाई की स्थिति से अधिक प्रभावित हुआ है, जिससे उनके अर्जन की वृद्धि की दर कुछ घटने की आशंका हो।

इसी तरह ऑटोमोबाइल, महँगी व टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुएँ के कामकाज में गिरावट की स्थिति बनती नजर आ रही है, क्योंकि ये दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ता माँग व ऊँची बैंक ब्याज से प्रभावित हुई है। फिर इस तिमाही में औद्योगिक आदान (उद्योगों का कच्चा माल व अन्य खपने वाली वस्तुएँ) के भाव में भारी वृद्धि हुई है- इससे उनके लाभ के मार्जिन पर असर पड़ने की आशंका है।

इसी तरह बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों के कामकाज में निश्चित ही तादात्मक वृद्धि परिलक्षित हो सकती है किन्तु उनकी बॉटम लाइन कुछ सिकुड़ी रह सकती है, इसके मुख्यतया दो कारण हैं- (1) कर्ज की माँग घटने से ब्याज की आमदनी प्रभावित होना एवं (2) वैश्विक वित्तीय बाजार की उठापटक से विदेशी मुद्रा के कामकाज में एवं डेरीवेटिव्ज के सौदों में घाटा होने की आशंका है।

लगता है कि छोटी-बड़ी कई कंपनियों के साथ बैंकों व वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों का इस घाटे को मार्क टू मार्केट की व्यवस्था के तहत अपने तुलन-पत्र में दर्शाना होगा। वित्तीय वर्ष 2007-08 की प्रथम छः माही अवधि में देश के केमिकल्स क्षेत्र की कंपनियों ने अच्छा कामकाज किया था। इस क्षेत्र की कंपनियों में जहाँ पूँजी निवेश भी अच्छा हुआ, वहीं उनके वित्तीय परिणाम भी काफी आकर्षक रहे थे।

वर्ष 2007-08 में अप्रैल से सितंबर की अवधि में देश की 56 केमिकल्स कंपनियों के निवल लाभ में 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि 2006-07 की इसी अवधि में वृद्धि की दर महज 5.7 प्रतिशत रही थी। किंतु चौथी तिमाही में निवेश की कमी ऊँची ब्याज एवं महँगाई की वजह से निवल लाभ की वृद्धि दर प्रभावित हो सकती है। कंपनियों का कहना है कि जरूरी कच्चा माल महँगा हो गया है एवं कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने पड़े हैं- इन सभी की वजह से न केवल लाभ का मार्जिन वरन कारोबार की मात्रा भी प्रभावित हुई है।

अगर उद्योगों के उत्पादन एवं लाभ के मार्जिन में कमी आती है तो उससे देश के औद्योगिक उत्पादों के सूचकांक (आईआईपी) में एवं फिर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भी गिरावट की आशंका बनी रहती है। अगर पिछले आँकड़ों को दोहराएँ तो स्पष्ट हो जाएगा कि देश के जीडीपी में औद्योगिक उत्पादन का भार 25 प्रतिशत है किन्तु नवंबर 2006 की तुलना में नवंबर 2007 में सकल निर्माता उद्योगों का उत्पादन एक तिहाई रह गया था, दिसंबर 2006 में औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक में 13.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई भी किंतु दिसंबर 2007 में वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रही।

यह सही है कि वैश्विक परिदृश्य कों देखते हुए 7.6 प्रतिशत की वृद्धि को अच्छा कहा जा सकता है किंतु देश में बेरोजगारी की दर घटाने एवं निर्यात बढ़ाने की दृष्टि से यह दर अर्थव्यवस्था में धीमेपन की सूचक है। अप्रैल से दिसंबर के नौ माह के आँकड़ों से धीमेपन की स्थिति स्पष्ट रूप से उभर जाती है। इससे सभी क्षेत्र में गिरावट की स्थिति स्पष्ट बन जाती है- ऐसे में जनवरी से मार्च की चौथी तिमाही के आँकड़ों में अधिक सुधार की संभावना कम ही है।

सरकार कहती है कि उसने निर्यातकों को काफी राहत दी है- किंतु निर्यातक उससे खुश नहीं हैं। चाहे धातु क्षेत्र के उद्योग हो या कपड़ा (टेक्सटाइल्स) एवं ऑटोमोबाइल्स वे या तो डॉलर की तुलना में महँगे होते रुपए के कारण या असहनीय महँगाई एवं उच्च ब्याज दर त्रस्त हैं- ऐसे में सकल रूप से कंपनियों के कामकाज में आ रहे धीमेपन को कैसे रोका जा सकता है?

मुद्रास्फीति की दर 7 प्रतिशत की ऊँचाई पर पहुँच गई है एवं खनिज तेल व खाद्यान्नों के बढ़ते भाव में देखते हुए मुद्रास्फीति में और वृद्धि की आशंका बनी हुई है। यही आशंका की वजह न केवल घरेलू बचत वरन औद्योगिक पूँजी निवेश एवं उपभोक्ताओं की माँग को प्रभावित कर सकती है। इस विपरीत परिस्थिति में भी अगर चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 7 प्रतिशत या उसके आसपास रहती है तो उसे शानदार कहना गलत नहीं होगा।
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