शेयर बाजार या कंपनियों व बैंकों के लिए नकारात्मक खबरों का सिलसिला जारी है। इसी कॉलम में देश के वित्तीय बाजार पर डेरीवेटिव्ज सौदों के संकट की बात कही गई थी एवं इस बात का भय व्यक्त किया गया था कि अगर डॉलर के मुकाबले येन (जापान की मुद्रा) अधिक मजबूत हुआ तो विदेशी मुद्रा के डेरीवेटिव्ज सौदों में कंपनियों व बैंकों को मार्केट की व्यवस्था अपने लाभ-हानि खाते में करना पड़ेगी व इससे उनके निवल लाभ का प्रतिशत घटेगा।
इसी भय की वजह से बैंकिंग क्षेत्र के शेयरों में कारोबारियों की दिलचस्पी घट गई थी एवं जनवरी माह से बैंकों के शेयरों में बेचान बढ़ गया था। हालाँकि ये शेयर निवेश के लिहाज से अच्छे हैं बावजूद उनके भावों का उच्चतम स्तर घटने की संभावना के अर्थात उनके भाव की ऊपरी सीमा अब घट गई है। फिर वैसे ही बढ़ती मुद्रास्फीति व औद्योगिक मंदी की वजह से बैंकिंग क्षेत्र को कर्ज की घटी हुई माँग का सामना भी करना पड़ सकता है। सबप्राइम का संकट यथावत है एवं अमेरिका व योरप में मंदी की स्थिति उभर रही है।
डेरीवेटिव्ज के सौदे वस्तु बाजार के कामकाज में होते हैं। उसी तरह बैंकों द्वारा दिए गए उधार के स्वाप्स सौदे भी होते हैं। बाजार की चर्चा के अनुसार एलएंडटी को वस्तु बाजार के डेरीवेटिव्ज कामकाज में 90 करोड़ रु. की हानि हुई है। कहा जा रहा है कि दिए गए उधार के स्वाप्स सौदों में आईसीआईसीआई को 26 करोड़ डॉलर के कामकाज को मार्क टू मार्केट के तहत घाटे में दर्शाना पड़ता है।
वास्तव में विदेशी मुद्रा व वस्तु बाजार के डेरीवेटिव्ज कामकाज में कई कंपनियाँ आहत हुई हैं। चर्चा के अनुसार एम्टेक ऑटो (मार्क टू मार्केट) का घाटा 1.80 करोड़ डॉलर का, इसी तरह हैक्सावेयर कंपनी पर भी मार्क टू मार्केट के घाटे की जिम्मेदारी आ पड़ी है। अभी तो बाजार में कई तरह की अफवाहें हैं और उनमें हर रोज नई-नई कंपनियों के नाम जुड़ रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि कंपनियाँ जब तक डेरीवेटिव्ज के कामकाज के घाटे को जाहिर नहीं करेंगी, तब तक अफवाहों का बाजार अधिक से अधिक गर्म होता जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के तहत इस घाटे को छिपाना या हिसाब-किताब के नए तरीकों का उपयोग करना गलत होगा।
डेरीवेटिव्ज के सौदे एक मायने में जोखिम घटाने हेतु किया जाने वाला हैजिंग का कामकाज है एवं एक हैजिंग के कामकाज की जोखिम का दूसरे हैजिंग में उपयोग नहीं किया जा सकता। भारतीय रिजर्व बैंक भी बाजार की स्थिति से अवगत है एवं वह हर बैंक व कंपनियों के डेरीवेटिव्ज के कामकाज के आकलन में व्यस्त है। डेरीवेटिव्ज के कामकाज में जिन छोटे दर्जे की कंपनियों को घाटा हुआ है, वे बैंकों के विरुद्ध कोर्टों में जा रही हैं। इस वजह से बैंकों पर दोहरी मुश्किल आ गई है।
एक ओर कोर्ट का दबाव रहेगा एवं दूसरी ओर भारतीय रिजर्व बैंक का। भारतीय रिजर्व बैंक ने यह स्पष्ट किया है कि सरकारी क्षेत्र की बैंकों ने डेरीवेटिव्ज का बहुत कम कामकाज किया है। जो भी किया है, वह उनके नियमित ग्राहक कंपनियों के साथ किया है। इसलिए उनके सामने परेशानियाँ कुछ कम हैं। किंतु निजी क्षेत्र की बैंकों व विदेशी बैंकों ने अधिक कामकाज किया है।
अपनी शुल्क की आय बढ़ाने के लिए उन्होंने कई कंपनियों को विदेशी मुद्रा के डेरीवेटिव्ज के सौदे करने के लिए प्रेरित किया। देश में इस क्षेत्र में हुए कुल कामकाज में 50 प्रतिशत हिस्सा विदेशी बैंकों का है, किंतु ये बैंकें भारत के शेयर बाजार से सूचीबद्ध नहीं हैं इसलिए कंपनी द्वारा उनके विरुद्ध मुकदमे दायर नहीं किए जा रहे हैं। इसलिए विदेशी बैंकों से डेरीवेटिव्ज के करार करने वाली भारतीय कंपनियों के नाम बाजार में फैली अफवाह में अधिक शुमार नहीं हैं।
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