सरकार ने केंद्रीय उत्पाद शुल्क में मूल्य वर्धित कर 'सेनवैट' की शुरुआत उद्योगों की सुविधा और उन पर कर बोझ कम करने के लिए की थी लेकिन धीरे-धीरे इस सुविधा का दुरुपयोग इस कदर बढ़ गया कि खुद सरकार को ही पिछले पाँच साल में इससे 100 करोड़ रु. से अधिक का चूना लग चुका है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है। अप्रत्यक्ष करों के भुगतान पर तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मोडवैट अथवा सेनवैट योजना के तहत उत्पाद तैयार करने की प्रक्रिया में कच्चे माल अथवा पूँजीगत सामान की खरीद पर भुगतान की गई ड्यूटी के एवज में क्रेडिट दिए जाने की सुविधा है।
यानी तैयार उत्पाद पर दिए जाने वाले उत्पाद शुल्क में से कच्चे माल अथवा कुछ पूँजीगत सामानों की खरीद पर दिए गए शुल्क को घटा दिया जाता है। इसके लिए कुछ शर्तों को पूरा करना होता है लेकिन इस सुविधा के दुरुपयोग से पिछले चार-पाँच साल में सरकार को 111 करोड़ 88 लाख रुपए का चूना लग चुका है।
सेनवैट क्रेडिट 143 प्रश बढ़ा : केंद्र सरकार के अप्रत्यक्ष कर खातों की मार्च 2007 तक की जाँच-पड़ताल पर आधारित इस रिपोर्ट में दिखाया गया है कि 2002-03 से 2006-07 के पाँच वर्षों में केंद्रीय उत्पाद शुल्क वसूली 43 प्रतिशत बढ़ी है जबकि इसी अवधि में लिया गया मोडवैट और सेनवैट क्रेडिट 143 प्रतिशत तक बढ़ गया। वर्ष 2002-03 में व्यक्तिगत लेजर खाते (पीएलए) के मुताबिक 82310 करोड़ रु. की एक्साइज ड्यूटी का भुगतान किया गया यह राशि 2006-07 में बढ़कर 117613 करोड़ रु. हो गई यह वृद्धि 43 प्रतिशत रही है जबकि इसी अवधि में सेनवैट अथवा मोडवैट क्रेडिट राशि 53039 करोड़ रु. से बढ़कर 128698 करोड़ रु. तक पहुँच गई यह वृद्धि 143 प्रतिशत रही।
योजना का दुरुपयोग जाहिर : वर्ष 2002-03 में जहाँ भुगतान की गई उत्पाद शुल्क राशि 82310 करोड़ रु. की तुलना में क्रेडिट राशि 64.44 प्रतिशत यानी 53039 करोड़ रु. थी वहीं यह पाँच साल बाद भुगतान की गई 117613 करोड़ रु. की उत्पाद शुल्क राशि के मुकाबले क्रेडिट राशि इससे भी आगे निकलकर 128698 करोड़ तक पहुँच गई। कैग का कहना है कि इससे साफ पता चलता है कि मोडवैट और सेनवैट क्रेडिट योजना का दुरुपयोग हो रहा है।
इस्को का दिया उदाहरण : कैग की इस रिपोर्ट में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) की इकाई इस्को के बर्नपुर स्थित इस्पात संयंत्र का एक मामला सामने रखते हुए कहा गया है कि यह इकाई विभिन्न प्रकार के उत्पाद शुल्क योग्य उत्पादों को बनाती है। इसमें काम आने वाले कई तरह के कच्चे माल पर यह क्रेडिट लेती है तथा इनका उपयोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तरीके से कोक और उत्कृष्ट कोक ओवन गैस में किया जाता है।
ऐसे उत्पादों के एक हिस्से का उपयोग आंतरिक तौर पर शुल्क योग्य उत्पादों को बनाने में किया गया जबकि बाकी हिस्से को बिक्री के लिए रख दिया गया जिस पर कोई शुल्क नहीं लगता है। शुल्क योग्य उत्पाद और बिना शुल्क वाले उत्पादों का हिसाब अलग-अलग नहीं रखा गया जिससे 62.59 करोड़ रु. का शुल्क भुगतान नहीं हुआ। यह अप्रैल 2003 से मार्च 2006 तक दी जानी थी।
नागार्जुन फर्टिलाइजर्स का उल्लेख : इसी प्रकार का एक अन्य मामला नागार्जुन फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स लिमिटेड विशाखापट्टनम का भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। इसमें कहा गया है कि रसायन और उर्वरक तैयार करने वाली यह कंपनी नाफ्था और प्राकृतिक गैस जैसे अहम कच्चे माल की प्राप्ति गेल इंडिया लिमिटेड से पाइप लाइन के जरिए प्राप्त करती है और इनका इस्तेमाल अमोनिया बनाने में करती है जो कि शुल्क योग्य उत्पाद है जबकि कंपनी यूरिया भी तैयार करती है जो कि शुल्क मुक्त उत्पाद है। कंपनी ने पाइप लाइन सेवाओं पर 1.35 करोड़ रु. का सेवा कर भुगतान किया और इस पर अगस्त से नवंबर 2005 के दौरान सेवा कर क्रेडिट हासिल कर लिया।
निर्धारणकर्ता ने इस दौरान साझा तौर पर उपयोग में लाई गई इनपुट सेवाओं का करमुक्त उत्पादों तथा दूसरे उत्पादों में उपयोग के खातों को अलग नहीं रखा। इस दौरान अगस्त से नवंबर के दौरान फैक्टरी से निकले यूरिया पर 11.85 करोड़ रु. की ड्यूटी बनती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संबंध में मंत्रालय का उत्तर और प्रत्युत्तर जो दिया गया उसमें पाया गया कि वह सेनवैट क्रेडिट नियम के किसी भी प्रावधान के तहत नहीं आता है।
रिपोर्ट में पुणे की मे. एमक्यूर फार्मास्युटिकल्स लि. इंदौर आयुक्तालय के तहत आने वाले रामा फास्फेट लिमिटेड उर्वरक इकाई, जयपुर आयुक्तालय के तहत हिन्दुस्तान पुलवराइजिंग मिल्स और इंसेक्टीसाइड इंडिया लिमिटेड, एहल्कॉन पैरांटल इंडिया लि और दमण आयुक्तालय के तहत आने वाले अतुल लिमिटेड का भी जिक्र किया गया है।
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