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एशिया में विकास की गति धीमी-संरा
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि अमेरिकी मंदी और पूँजी संकट के कारण वर्ष 2008 में एशिया प्रशांत क्षेत्र की अर्थ व्यवस्थाओं की विकास दर धीमी रहेगी, लेकिन क्षेत्र के विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं का उभरना जारी रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र में एशिया प्रशांत अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक आयोग ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि वर्ष 2007 में इस दशक की सर्वाधिक वृद्धि दर बनाए रखने के बाद एशिया प्रशांत क्षेत्र के देश इस वर्ष अपेक्षाकृत धीमी विकास दर पर बने रह सकते है, हालाँकि यह धीमी होने के बावजूद 7.7 प्रतिशत प्रति वर्ष के आस पास होगी।

अध्ययन में क्षेत्र की विकसित अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर का अनुमान 1.6 प्रतिशत लगाया गया है, जबकि वर्ष 2007 में 2.0 प्रतिशत रही थी। इसके अलावा पूरे क्षेत्र में खाद्य पदार्थों के दाम उच्च स्तर पर बने रह सकते हैं, जिससे मुद्रास्फीति का खतरा पैदा होगा, क्योंकि उपभोक्ताओं की आय का ज्यादातर हिस्सा खाद्य पदार्थों पर खर्च होता है।

अध्ययन में कहा गया है कि क्षेत्र में वर्ष 2008 के दौरान मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि पिछले वर्ष यह 5.1 प्रतिशत रही थी।

अध्ययन में भारत के संदर्भ में कहा गया है कि देश की अर्थव्यवस्था का विकास 8.5, 9.5 प्रतिशत की दर से होता रहेगा, लेकिन इस पर कच्चे तेल और खाद्य पदार्थों की उच्च कीमतों का दबाव बना रहेगा। वर्ष 2007 में देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 8.7 प्रतिशत रही है। भारत में मुद्रास्फीति की दर पाँच प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

अध्ययन में कहा गया है कि अमेरिका में आवासीय ऋण संकट से आई मंदी, अमेरिका और यूरोप में पूँजी संकट, डॉलर के मुकाबले क्षेत्र की मुद्राओं का मजबूत होने से क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित होगी।

अमेरिकी मंदी का सबसे अधिक असर यह होगा कि क्षेत्र से होने वाले निर्यात में कमी आएगी। इसके अलावा मंदी से निपटने के लिए अमेरिका ने अपनी ब्याज दरो में आक्रमक रुख अपनाते हुए कटौती करने तथा डॉलर के कमजोर होने से कच्चे तेल के दाम बढ़ने के कारण भी एशिया प्रशांत क्षेत्र की अर्थ व्यवस्थाएँ धीमी गति से विकास करेगी। क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं पर दोहरा प्रभाव होगा। एक ओर तो उनके निर्यात मे कमी आएगी दूसरी ओर उनकी घरेलू माँग घटेगी।

अध्ययन में दावा किया गया है कि अमेरिका और शेष विश्व की अर्थव्यवस्थाओं के बीच असंतुलन बढ़ने और वैश्विक वित्त बाजार की उथल-पुथल से क्षेत्र की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले मजबूत होगी।

विश्व बैंक ने भी कहा है कि यूरोप और अमेरिका में मंदी का असर एशिया में भी दिखेगा। सिटीग्रुप ने भी एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए विकास दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया है। इससे पहले ग्रुप ने क्षेत्र के लिए विकास दर 8.2 प्रतिशत रहने की भविष्यवाणी की थी।

सिटी ग्रुप ने अपने अनुमानों को संशोधित करते हुए कहा है कि चीन की विकास दर वर्ष 2008 में 9.8 प्रतिशत रहेगी, जबकि पहले 10.5 प्रतिशत का अनुमान लगाया गया था। भारत की विकास दर के लिए ग्रुप ने वर्ष 2008 में 7.7 प्रतिशत का अनुमान व्यक्त किया है, जबकि पहले यह 8.3 प्रतिशत था।
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