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आयकर कानून ने जोड़ी नई उपधारा
वर्षों से लंबित मामलों को जल्दी निपटाने में मिलेगी मदद
आयकर विभाग ने स्पष्ट किया है कि वित्त विधेयक 2008 में आयकर कानून की धारा 271 में एक नई उपधारा जोड़ने के पीछे मुख्य उद्देश्य वर्षों से लंबित पुराने मामलों को निपटाना है। इस उपधारा के जोड़ने से करदाताओं के विरोधी मत रखने के अधिकार को कोई नुकसान नहीं होगा।

वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के 2008-09 के आम बजट में वित्त विधेयक के अनुच्छेद 48 में आयकर कानून की धारा 271 में एक नई उपधारा 1बी जोड़ी गई है। इसमें कर निर्धारण अधिकारियों को इस धारा की उपधारा एक के तहत जुर्माने की प्रक्रिया की शुरुआत को ही यह मान लिया जाएगा कि निर्धारण अधिकारी ने मामले में पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही जुर्माने की कारवाई शुरू की है।

वित्त विधेयक 2008 में किए गए इस प्रावधान को पिछले वर्षों से लागू किए जाने को लेकर शंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं। कहा जा रहा है कि इस संशोधन के जरिए कर निर्धारण अधिकारियों को आय छुपाने अथवा कम दिखाने पर कार्रवाई के मामले में ज्यादा शक्तिसंपन्न बना दिया गया है।

दरअसल, यह मामला पिछले करीब 40-50 सालों से कर विभाग और करदाताओं के बीच विवाद का विषय बना हुआ है कि आय कम दिखाने अथवा छुपाने के मामले में कोई भी दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले कर अधिकारी को मामले को लेकर पूरी तरह संतुष्ट हो जाना चाहिए या फिर उसे अलग से लिखित में इसे रिकार्ड करना चाहिए।

समय-समय पर विभिन्न कंपनियों और करदाताओं के मामले में न्यायालयों ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी पेनॉल्टी नोटिस जारी करने से पहले निर्धारण आयकर अधिकारी को पहली नजर में संतुष्ट होना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि वह हर मामले में अपनी संतुष्टि को लिखित में रिकार्ड करें।

वर्ष 1962 में उच्चतम न्यायालय और फिर 1977 में कोलकाता उच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में इस प्रकार का निर्णय दिया। लेकिन वर्ष 2000 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को कुछ इस तरह परिभाषित किया और फैसला दिया कि निर्धारण अधिकारी को अपना मत बनाकर कोई भी दंडात्मक प्रक्रिया शुरू करने से पहले लिखित में इसे रिकार्ड करना चाहिए।

हालाँकि इसके बाद वर्ष 2002 में एक अन्य मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय से असहमति जताते हुए कहा कि निर्धारण अधिकारी को आयकर कानून की धारा 273 के तहत पूरी तरह संतुष्ट तो होना चाहिए लेकिन यह जरूरी नहीं कि दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले वह इसे लिखित में रिकार्ड करे।

आयकर विभाग द्वारा जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि न्यायालयों के विविध निर्णयों को देखते हुए ही वित्त विधेयक 2008 में कानून में ही संशोधन कर इस पेचीदा स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। इसीलिए पूर्वप्रभाव से अमल में आने वाली नई उपधारा आयकर कानून की धारा 271 में जोड़ी गई है ताकि वर्षों से लंबित आयकर के मामले निपटाए जा सकें और करदाताओं के अधिकार भी सुरक्षित रहें।

हालाँकि कर निर्धारण अधिकारी कोई भी जुर्माने की कार्रवाई शुरू करने से पहले अपनी संतुष्टि को रिकार्ड करे, उसे यह अधिकार है। इस प्रकार नए प्रावधान से जहाँ एक तरफ स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत का भी उल्लंघन नहीं हुआ है और करदाताओं के प्रति भी कोई पूर्वाग्रह नहीं रखा गया है।
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