- विट्ठल नागर
भारत में यह संकट अब उभर रहा है। जिन कंपनियों एवं बैंकों ने विश्व बाजार में मुद्रा व ब्याज दर के डेरीवेटिव्ज के सौदे किए हैं उन्हें येन की विनिमय दर बढ़ने से घाटा हो सकता है। जिन्होंने विदेशी एसेट्स (बॉण्ड या डिबेंचर आदि) का कामकाज किया है उन्हें भी परेशानियाँ उठानी पड़ सकती हैं। क्रिसिल ने विदेशी कंपनियों को भारतीय अनुषंगियों की साख दर का पुनरीक्षण करना शुरू कर दिया है।
यह तय है कि अप्रैल माह में घोषित होने वाली मौद्रिक नीति में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दर नहीं बढ़ाएगा। हाँ रिपो (रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों से लिया जाने वाला उधार) पर ब्याज दर घटा सकता है, जो कि बैंकों की लागत में वृद्धि का कारक होगा। यह दर अभी दस प्रतिशत है। फिर मई माह में घोषित होने वाले कंपनियों के वर्ष 2007-08 के चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च) के परिणाम भी कुछ आशाप्रद हो सकते हैं।
इसी माह संशोधित आयात-निर्यात नीति भी जाहिर होगी, जिसमें निर्यातकों को अच्छी राहत मिल सकती है। किंतु इन तमाम सकारात्मक कारणों के बावजूद न तो शेयर बाजार अधिक राहत महसूस कर सकेगा और न उद्योग। आम उपभोक्ताओं की परेशानियाँ भी कुछ बढ़ेंगी ही।
जब (जनवरी 2008 में) बीएसई सेंसेक्स 21,200 के शिखर पर पहुँच रहा था, तब सभी क्षेत्रों को यह लग रहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था उम्दा है एवं आरहेगा। अब लगता है कि यह भूतकाल की बात हो गई, जबकि वृद्धि की स्थिति अभी भी बेहतर है। बस प्रश्न यही है कि क्या देश की अर्थव्यवस्था वैश्विक वित्तीय बाजार के अंधड़ का सामना सरलता से कर सकेगी?
विश्व बाजारों में तरलता का समुद्र अमेरिका व जापान ने बताया था और अब ये दोनों ही देश आर्थिक मंदी के भय से बुरी तरह त्रस्त हैं। जापान की बैंकों ने अरबों-खरबों डॉलर के कर्ज येन में दिए थे और वह भी एक या दो प्रतिशत की ब्याज दर पर। ये ही कर्ज अन्य मुद्राओं में बदलकर दुनियाभर के बाजारों में खपा दिए गए।
फिर चाहे शेयर बाजार हो, लौह-अलौह धातु बाजार, बुलियन या वस्तु बाजार। सभी बाजार तरलता से लबालब हो गए जिससे शानदार तेजी की स्थिति बन गई। किंतु अमेरिका के सबप्राइम के संकट की वजह से अमेरिका व योरप की बड़ी-छोटी बैंकें एवं निवेशक संस्थाएँ भारी घाटे में आ गईं तो येन की तरलता सभी बाजारों से बाहर होने लगी एवं भारी बेचान करने लगी। इससे सभी बाजार डगमगा गए।
येन के इसी कारोबार को 'कैरी ओवर ट्रेड' कहते हैं। सेबी द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार जनवरी से लेकर अभी तक विदेशी कोषों ने भारत के शेयर बाजार में 3.8 अरब डॉलर का बेचान किया है एवं गत सात सत्रों में उनका बेचान 69.10 करोड़ डॉलर का हुआ है। यह सही है कि यह सब बेचान कैरी ओवर ट्रेड का न हो और संभव है शेयर बाजार से निकलकर वह विश्व के बुलियन या वस्तु बाजार में लग रहा है। खनिज तेल का बाजार भी संभवतया नए निवेश से आकर्षक बन रहा हो किंतु वह इन बाजारों से निकला तो स्थिति पुनः गड़बड़ाएगी।
अब तो यही लगता है कि 11-12 अप्रैल के बाद एक और धमाका हो सकता है। इस तिथि को वाशिंगटन में सात संपन्न देशों का सम्मेलन होने वाला है जिसमें अमेरिका पर यह दबाव डाला जाएगा कि वह डॉलर को मजबूत बनाए। जिस बात के लिए अमेरिका चीन की आलोचना कर रहा था अब वही काम अमेरिका अपने यहाँ दुहरा रहा है। वह डॉलर को नरम बनाकर अपना निर्यात बढ़ा रहा है।
ऐसा करके एक ओर चालू खाता (आयात-निर्यात का) सुधार रहा है एवं जीडीपी दर में वृद्धि लाने का प्रयास कर रहा है। किंतु उसके इस प्रयास से जापान व पश्चिमी योरपीय देशों को अधिक चोट पहुँच रही है, क्योंकि डॉलर की तुलना में उनकी मुद्रा की विनिमय दर मजबूत होने से उनका निर्यात घट रहा है एवं उनकी अर्थव्यवस्था मंदी की शिकार हो रही है।
अमेरिका को यह भय है कि अगर डॉलर की विनिमय दर बढ़ेगी तो उसका निर्यात घटेगा एवं आर्थिक मंदी की स्थिति अधिक विकट बनेगी। विश्व के बाजारों की तेजी-मंदी की स्थिति 11-12 अप्रैल की बैठक के परिणामों पर आधारित हो सकती है। अगर कोई सकारात्मक घोषणा हुई तो ठीक है अन्यथा विदेशी मुद्रा बाजार में बैंक ऑफ जापान का हस्तक्षेप बढ़ेगा एवं वह डॉलर के बदले येन बेचकर येन की विनिमय दर घटाने की प्रक्रिया शुरू कर देगा।
वास्तव में वैश्विक वित्तीय बाजार पर जो संकट मँडरा रहा है, उसकी बुनियाद में अमेरिका व जापान द्वारा बढ़ाई गई असीमित तरलता एवं नियामक (रेग्युलेटरी) व्यवस्था का अभाव है। इसी अभाव की वजह से अमेरिका में 'सबप्राइम' का संकट पैदा हुआ एवं वैश्विक कंपनियाँ, बैंकें व निवेशक संस्थाएँ उस संकट में उलझ गईं।
उन्हें संकट से उबारने के लिए पश्चिमी योरप की केंद्रीय बैंकों, अमेरिका व जापान की केंद्रीय बैंकों ने अरबों डॉलर के कर्ज दिए एवं तरलता बढ़ाने का प्रयास किया किंतु तरलता बाजार में नहीं आई। अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर दूसरी-तीसरी बार घटाई। जो ब्याज दर सितंबर 2007 के पूर्व 5.25 प्रतिशत थी, वह अब घटकर 2.55 प्रतिशत रह गई है।
यही नहीं, अमेरिका में आवास घरों के रेहन (मार्टगेज) रखकर जारी गईं प्रतिभूतियाँ कागज के टुकड़े बन गई थीं। उन्हें फेडरल रिजर्व ने स्वीकार कर उनकी एवज में सरकारी प्रतिभूतियाँ व कर्ज देना स्वीकार किया। जब अमेरिका की बड़ी वित्तीय कंपनी बियर स्ट्रेन्स दिवालिया हो गई तो फेडरल रिजर्व ने बेमायने हुई प्रतिभूतियों के एवज में मार्गन स्टेन्ले को बड़ा कर्ज दिया ताकि वह बियर स्ट्रेन्स को खरीदकर वैश्विक वित्तीय बाजार को डूबने से बचा सके। फेडरल रिजर्व के सभी निर्णय साहसभरे हैं किंतु किसी को इस बात का पूरा विश्वास नहीं है कि सबप्राइम का संकट अब नहीं उभरेगा।
अमेरिका यह चाहता है कि उपभोक्ता व व्यवसायी अधिक खर्च करें एवं आर्थिक मंदी की स्थिति न बन पाए। भारत में यह संकट अब उभर रहा है। जिन कंपनियों एवं बैंकों ने विश्व बाजार में मुद्रा व ब्याज दर के डेरीवेटिव्ज के सौदे किए हैं उन्हें येन की विनिमय दर बढ़ने से घाटा हो सकता है।
जिन्होंने विदेशी एसेट्स (बॉण्ड या डिबेंचर आदि) का कामकाज किया है उन्हें भी परेशानियाँ उठानी पड़ सकती हैं। क्रिसिल ने विदेशी कंपनियों को भारतीय अनुषंगियों की साख दर का पुनरीक्षण करना शुरू कर दिया है। अंतरंग कामकाज में वैश्विक प्रणाली से जुड़ाव की स्थिति ने ही संकट को भारत में ला खड़ा किया है और हर नकारात्मक वैश्विक खबर से भारत में बेचान को बढ़ावा मिल रहा है, हालाँकि भारतीय अर्थव्यवस्था के घटक मजबूत हैं। ये घटक धीरे-धीरे ही ऐसे बेचान को जब्ज करने की स्थिति में पहुँच सकते हैं।
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