- विट्ठल नागर
अमेरिकी सब प्राइम की आँच भारत भी पहुँच रही है। वहाँ आवास गृह मार्टगेज कंपनियों को भारी घाटा हुआ है, क्योंकि कमजोर साख क्षमता वालों को अपने आवास के मूल्य से काफी अधिक रकम किस्तों में चुकानी पड़ रही है, इसलिए वे न तो आवासगृह संभाल रहे हैं और न किस्तें चुका रहे हैं।
उन्हें कर्ज देने वाली मार्टगेज कंपनियों ने पूँजी बाजार में डिबेंचर जारी कर भारी कर्ज जुटाया था किंतु अब वे डिबेंचरों का विमोचन नहीं कर पा रहे हैं। उनके डिबेंचर बड़ी-छोटी वित्तीय कंपनियों व बैंकों ने खरीदे थे, जो अरबों डॉलर के हैं और अब वे कागज के टुकड़े बन गए हैं जिससे वित्तीय कंपनियाँ, बैंकें एवं अन्य कंपनियाँ भारी घाटे में आ गए।
हालाँकि भारतीय बैंकों का इस सब प्राइम से कोई सीधा संबंध नहीं है, क्योंकि उन्होंने नियमित आय के लिए जो निवेश किया था या वैश्विक वित्तीय कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों को दिए गए भारी कर्ज की गारंटी के तहत जो ऋण पत्र (नोट या बॉण्ड) जारी हुए थे, उनके भाव घट गए हैं।
लिहाजा, अपने लेखे में ऊँचे मूल्य पर जारी उन ऋण-पत्रों के मूल्य को बाजार आधारित बनाना पड़ रहा है एवं उनके मूल्य में जो ह्रास हुआ है उसका प्रावधान करके लाभ-हानि खाते में दर्शाना पड़ रहा है। इसे ही 'मार्क टू मार्केट' का घाटा कहते हैं। यह घाटा एक मायने में सांकेतिक है, क्योंकि आज नहीं तो छः माह या एक वर्ष बाद उन ऋण पत्रों के मूल्य बढ़ेंगे तो मार्क टू मार्केट के तहत उन्हें लाभ दर्शाना पड़ेगा। लिहाजा, भारतीय बैंकों ने जो निवेश किया है अथवा प्रतिभूतियाँ खरीदी हैं उनकी गुणवत्ता में कोई विशेष फर्क नहीं आया है।
अभी तक जो आँकड़े जाहिर हुए हैं, उसके अनुसार देश की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की आईसीआईसीआई एवं उसकी विदेशों में स्थित सहायक इकाइयों पर करीब 2.2 अरब डॉलर की जोखिम है जिसमें से 50 करोड़ डॉलर की जोखिम विदेशी सहायक इकाइयों की है। इन दोनों के तहत लेखे में मार्क टू मार्केट का घाटा 26.30 करोड़ डॉलर का है। इसी तरह सरकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी बैंक एसबीआई के संबंध में बाजार में जो बात कही जा रही है, उसके अनुसार उसकी जोखिम 1.5 अरब डॉलर की है एवं मार्क टू मार्केट का घाटा 20 करोड़ डॉलर का हो सकता है।
इसी तरह बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ पंजाब को भी निवेश के तहत जोखिम उठानी पड़ सकती है। वास्तव में देश की जिन बैंकों की विदेशों में सहायक इकाइयाँ हैं, उन्हें विदेशी वित्तीय बाजार के कामकाज की जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। फिर जब तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार संकट से नहीं उबरता, तब तक मार्क टू मार्केट का घाटा दर्शाने की स्थिति बनी रह सकती है।
देखा जाए तो इन घाटों से बैंकों की लाभप्रदता पर कोई भारी असर पड़ने वाला नहीं है इसलिए जिनके पास इन बैंकों के शेयर हैं उनमें घबड़ाहट नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय पूँजी बाजार को ठीक होने में संभव है एक वर्ष से अधिक समय नहीं लगेगा।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार काफी विस्तृत एवं गहरे हैं एवं उनमें हर तरह के फायदे (फ्यूचर एंड ऑप्शन) के सौदे होते हैं। तेजी की स्थिति में उनमें आय भी खूब होती है और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इस बाजार से लंबा-चौड़ा कोष जुटा लेती हैं, क्योंकि उनमें तरलता बहुत अधिक रहती है।
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