- विट्ठल नागर
अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा यकायक अंतरबैंक के अल्प अवधि के लेन-देन (कोष उधार देना व लेना) की ब्याज दर में पौन प्रतिशत की जो ऐतिहासिक कमी की गई है, उसी के परिप्रेक्ष्य में भारत में भी यह सोचा जा रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक भी ब्याज दर घटाएगा और मुद्रा संकुचन की नीति को कुछ उदार बनाएगा, क्योंकि अमेरिका व भारत की अल्प अवधि की ब्याज दरें काफी विभेदक बन गई हैं।
तुलना में भारत की ब्याज दर चार प्रतिशत अधिक है, जिससे अमेरिकी निवेशकों के लिए अमेरिकी बैंकों से अपनी बचत निकालकर भारत की बैंकों में जमा कराना काफी लाभप्रद बन गया है। वास्तव में देश की मुद्रानीति का निर्धारण देश में डॉलर की बढ़ती आवक को ध्यान में रखकर निर्धारित किया गया है। जब देश में आने वाले डॉलर का कोई खरीददार नहीं होता तो भारतीय रिजर्व बैंक को डॉलर खरीदना पड़ता है, रुपए का भुगतान करके।
इससे प्रणाली में रुपए की प्रवाहिता बढ़ती है, जो मूल्यवृद्धि को बढ़ाती है। रिजर्व बैंक मूल्यवृद्धि को रोकने के लिए बैंकों को सीआरआर बढ़ाती है, मुद्रा के फैलाव (बैंक कर्जों को फैलाव) को कम करने के लिए सख्त नीति अपनाती है एवं बैंक कर्ज को महँगा करती है, ताकि उपभोक्ता बैंक कर्ज के माध्यम से अपना उपभोग न बढ़ाए।
लिहाजा निष्कर्ष यही निकलता है कि ब्याज दर व महँगी मुद्रा की नीति नरम तभी बन सकती है, जब देश में डॉलर की आवक कुछ धीमी पड़े, जबकि संभावना यही है कि अमेरिकी मुद्रा व वित्तीय बाजार में फैली ऊहापोह को देखते हुए भारत में डॉलर की आवक बनी रहना संभव है।
शेयर बाजार में 21 व 22 जनवरी को शेयरों के भावों में ऐतिहासिक रूप से जो रिकॉर्ड फिसलन की स्थिति बनी उसे देखते हुए भी देश में डॉलर की आवक बढ़ सकेगी, क्योंकि विदेशी निवेशकों में भारत में घटे भावों पर शेयर खरीदकर अच्छा मुनाफा कमाने का लालच हो सकता है।
फिर भारत ने रियल स्टेट भवन निर्माण में अच्छा लाभ है, भारत की कंपनियाँ अच्छा मुनाफा कमा रही हैं अर्थात विदेशी निवेशकों की राय में अन्य उभरते हुए बाजारों की तुलना में भारत में लाभ कमाने के अवसर अधिक अच्छे हैं। इससे डॉलर की आवक को बढ़ावा मिल सकता है, उससे भारतीय रिजर्व बैंक की स्थिति पसोपेशपूर्ण बन सकती है।
इसके विपरीत सही बात यह है कि अगर विकसित देशों में वित्तीय बाजार में फैली घबराहट की स्थिति अधिक जोखिमभरी हुई अथवा विश्व के सभी बाजारों में मंदी की स्थिति बनती है तो संभव है देश में डॉलर की आवक अधिक न हो तो भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दर घटाने के साथ कर्ज के फैलाव के प्रतिबंध ढीले करने पड़ सकते हैं एवं बाजार में प्रवाहिता में वृद्धि लाना जरूरी हो जाएगा। देश में डॉलर की आवक बढ़ेगी या घटेगी इसका आकलन भारतीय रिजर्व बैंक ही अपने बढ़े-चढ़े साधनों से कर सकता है।
वैसे अभी तक कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको एवं ब्रिटेन बैंक ब्याज दर घटा चुके हैं। जापान की केंद्रीय बैंक का कहना है कि स्थिति आर्थिक मंदी की है, किंतु वह ब्याज दर अभी नहीं घटाएगा। वैसे भी जापान में ब्याज दर सबसे कम अर्थात 0.50 प्रतिशत है। आश्चर्य निश्चय ही अमेरिका के फेडरल रिजर्व के चेयरमैन के वक्तव्य से होता है।
एक पखवाड़े पूर्व उन्होंने कहा था कि फेडरल बैंक की सबसे बड़ी चिंता मुद्रास्फीति व महँगाई को कम करना है इसलिए अमेरिका की आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने के उपाय करना उसके निशाने पर नहीं है।
इसका स्पष्ट मतलब यही था कि अभी ब्याद दर नहीं घटाई जाएगी, किंतु एक पखवाड़े के बाद स्थिति में ऐसा क्या बदलाव आ गया कि ब्याज दर निर्धारित करने वाली 'ओपन मार्केट कमेटी' की बैठक हेतु निर्धारित तिथि के एक सप्ताह पूर्व ही बैंक ब्याज दर में भारी कटौती की घोषणा करके दर को 3.5 प्रतिशत पर ला दिया।
ऐसा करने के कारण बताते हुए यह कहा गया कि यह निर्णय आर्थिक परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में लिया गया है। आर्थिक परिदृश्य अधिक कमजोर बनने के साथ ही आर्थिक वृद्धि दर के अधिक घटने की जोखिम बढ़ गई है।
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