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न सत्यम्‌, न शिवम्‌, न सुंदरम्‌
अर्थव्यवस्था की कुरूपता पिछले चार वर्षों में बाजार पर हावी हुई महँगाई में दिखाई देती है। देश में बहुसंख्यक, मध्यम और निम्न आय वर्ग के साथ-साथ किसान, मजदूर, सर्वाधिक पीड़ित और ग्रसित हैं। वित्त मंत्री ने भाषण की शुरुआत में महँगाई को कम करने का उद्देश्य निरूपित किया, लेकिन भाषण समाप्त होते-होते वे मुद्रास्फीति या महँगाई को भूल गए।

वास्तविकता यह है कि सरकार द्वारा महँगाई वृद्धि का जो सूचकांक जारी किया जाता है, उसमें सम्मिलित की गई वस्तुओं में खान-पान की चीजों का हिस्सा सिर्फ 20 प्रतिशत ही रहता है, जबकि 80 प्रतिशत उपभोक्ता के मासिक बजट में 77 से 80 फीसदी हिस्सा खान-पान की वस्तुओं का निर्धारित रहता है तथा वह इनकी निरंतर बढ़ रही कीमतों में पिसता रहता है।

न मालूम क्यों वित्त मंत्री मुद्रास्फीति के साथ विदेशी मुद्राकोष के बेहतर उपयोग के लिए सॉवरेन वेल्थ फण्ड के गठन की बात भूल गए। भारत में 285 अरब डॉलर के देश के विदेशी मुद्रा भण्डार का उपयोग केवल सरकारी बॉण्डों और सिक्युरिटी सेटिंग में हो रहा है, जिस पर देश को 5 प्रतिशत ब्याज ही मिलता है, जबकि चीन, सऊदी अरब, सिंगापुर समेत 20 देशों में स्थापित सॉवरेन वेल्थ फण्ड का उपयोग पुनः विदेशों में निवेश कर 20 प्रतिशत कमाया जा रहा है।

उम्मीद की जा रही थी कि वित्त मंत्री ग्यारहवीं योजना के दूसरे वर्ष में बचत और निवेश को प्रोत्साहित कर कृषि क्षेत्र के साथ-साथ औद्योगिक और सेवा क्षेत्र को सतत विकास की दिशा में मोड़ते हुए ऐसे अग्रगामी प्रभाव उकेरने में सहायक होंगे, लेकिन समावेशी बजट के चित्र में न तो वे सत्यं, न शिवं और न सुदरं को ही चरितार्थ कर पाए। (नईदुनिया)
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