मुख्य पृष्ठ > खबर-संसार > व्यापार > कृषि
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
कपास में कीट एवं रोग नियंत्रण
पत्तियों को खाने वाले व तना छेदक कीड़े-

पत्तियों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों में हरी इल्ली या सेमीलूपर (इल्लियाँ हरे रंग की होती हैं व शरीर मोड़कर चलती हैं) व पत्ती लपेटने वाली इल्ली या लीफ रोलर (इल्लियाँ चमकीले गहरे रंग की होती हैं व पत्तियों को लपेटकर उनमें रहती हैं) मुख्य हैं। इन इल्लियों का प्रकोप अगस्त से अक्टूबर माह में होता है। तना छेदक इल्ली प्रारम्भिक बाढ़ अवस्था में तनों में छेदकर नुकसान करती हैं।

नियंत्रण के उपाय-

2 लीटर नीमगो + 4 लीटर गोमूत्र + 4 लीटर सड़ी हुई छाँछ मिलाकर प्रति एकड़ पौधों पर छिड़काव करें। मुड़ी हुई पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर दें।

जड़-सडन रोग : यह रोग फफूंदों से होता है व हलकी जमीनों में अधिक पाया जाता है। इस रोग में पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं एवं पौधे मरने लगते हैं।

रोकथाम के उपाय-

15 से 20 ग्राम ट्रायोहिट प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर बोएँ। रोगग्रस्त पौधे निकालकर नष्ट कर दें।

नियंत्रण उपाय-

1 किलोग्राम ट्रायोहिट 50 लीटर पानी में घोलकर पौधे के गौड़ में छिड़काव करें।

काले धब्बे वाला रो

(ब्लैक आर्म) : यह रोग शाकाणुओं के द्वारा होता है। पत्तियों पर गाढ़े भूरे रंग के नुकीले धब्बे बनते हैं व ये धब्बे पत्तियों की नसों के बाजू से फैलते हैं। धब्बे शाखाओं एवं बीडियों (डेडूओं) पर भी पाए जाते हैं। रोग ग्रसित पत्तियाँ एवं डेण्डू झड़ने लगते हैं। यह रोग बीज द्वारा फैलता है।
रोकथाम के उपाय-

ट्रायोहिट उपचारित बीज बोएँ।

नियंत्रण के उपाय-

2 लीटर नीमगो + 4 लीटर गोमूत्र + 4 लीटर सडी हुई छाँछ पानी में घोलकर छिड़काव करें। (अहिंसक खेती)
<< 1 | 2 
और भी
फल खाएँ स्वस्थ रहें
गुणों की खान गाजर
बायो टेक्नोलॉजी खाद व द्वितीय हरित क्रांति
सूखते खेत, पिछड़ती खेती
क्या बोएँ क्या न बोएँ
बोने से पहले बीजों को पहनाएँ सुरक्षा कवच