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बायो टेक्नोलॉजी खाद व द्वितीय हरित क्रांति
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-डॉ. विनोदलाल न श्रॉफ प्रथम हरित क्रांति नार्मन बोरलाग द्वारा पौध प्रजनन क्रिया द्वारा कम ऊँचाई के गेहूँ की किस्मों द्वारा आई प्रथम हरित क्रांति ने वही सफलता प्राप्त की, जहाँ अधिक पौध पोषण, रासायनिक उर्वरक व सिंचाई के साधन उपलब्ध थे। चालीस वर्ष बाद अब इन सिंचित क्षेत्रों के उत्पादन में भी ठहराव आ गया है। परिणामतः भारत अनाज निर्याक देश से अनाज आयात करने हेतु विवश हुआ है।
उत्पादन की वृद्धि दर में इजाफा हो, उस हेतु 'बायो टेक्नोलॉजी' एक सशक्त विकल्प हो सकता है। बायो टेक्नोलॉजी का अर्थ आनुवांशिक इंजीनियरिंग द्वारा उन्नत (जेनेटिकली मोडिफाइड-जीएम) फसलें मात्र नहीं है, फिर वह बीटी कपास हो या अन्य फसलें, फल साग, सब्जियां ही क्यों नहीं हों। मात्र एक दो जीन बदल देना ही फसल उत्पादन में आने वाली समस्याओं का समाधान नहीं है। बीटी कपास का ही उदाहरण ले तो उसमें रस चूसक व अन्य कीड़ों का व पत्तियों का लाल होने का प्रकोप, सूखना, अप्रत्याशित मौसम, जल जमाव या सूखे के प्रति सहनशीलता का अभाव तो है ही, इन कारणों से गुजरात, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश व अन्य कृषकों का उससे मोहभंग होता जा रहा है।
समन्वित फसल उत्पादन तकनीक : फसल उत्पादन में आनुवांशिक उच्च गुणवत्ता के अलावा अन्य तकनीकों, भूमि का प्रकार, जलवायु, फसल प्रणाली भी अहम भूमिका निभाते हैं, ये सिद्ध किया जा चुका है। जैविक खाद-कम्पोस्ट भूमि में उपलब्ध जीवाणु जैसे शाकाणु, फफूंद, (अर्थवर्म)- केंचुए का भोजन है। जैव कार्बन 0.5 प्रतिशत से अधिक होने पर आबोहवा में उपलब्ध नत्रजन व भूमि में उपलब्ध खनिज जीवाणुओं द्वारा अवशोषणीय अवस्था में परिवर्तित करके पौधों का पोषण बनता है। अतः जीवाणु कल्चर जैसे स्फुर घोलक, राइजोबिया, एजेटोबेक्टर, प्रोटेक्ट-ट्राइकोडर्मा, एस्परजिलस का उपयोग लाभकारी है। भूमि में जैव क्रियाओं में वद्धि हो, उस हेतु गोबर, गुड़, गन्ना, गोमूत्र से बने कोरीन का छिडकाव भूमि पर करें। कम्पोस्ट उपलब्ध नहीं हो तो ऑर्गेनिक खाद 50 किलोग्राम प्रति एकड़ वापरें, वह एक टन कम्पोस्ट के समतुल्य है। फसल प्रबंधन : विभिन्न फसलों में संतुलन, रसायन के साथ में ऑर्गेनिक खेती पद्धति एक-दूसरों की पूरक हो, जल का संतुलित उपयोग व अतिरिक्त जल की निकासी सिंचित क्षेत्र की भूमि को बंजर 'डिग्रेड' होने से बचाया जा सकेगा व उसकी उर्वरा शक्ति को अक्षुण्ण रखना सम्भव होगा। वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र विशेषकर ढलान वाले पहाड़ी क्षेत्र में मिट्टी को बहने से रोकने के साथ में जल संग्रह हेतु ट्रेंच-नालियां, तलैया, कुओं, पोखर-तालाब की श्रृंखला ऊंचे क्षेत्र में बने, याने 'रिज' पर इन उपायों से पहाड़ी क्षेत्र, वर्षा आधारित क्षेत्र के छोटे, लघु कृषक अप्रत्याशित मौसम सूखा या अधिक वर्षा होने पर भी सामान्य उत्पादन ले सकेंगे।
जल प्रबंध : भूमिगत जल के दोहन को नियंत्रित करना होगा। गहराई से प्रपात जल में घुलनशील लवण अधिक मात्रा में होने से वह खेती, उद्योग व पेयजल के रूप में सुरक्षित नहीं है। जितना जल भूमि से लिया जाता है, उतना जल रिचार्ज पुनर्भरण करना अनिवार्य करने का समय आ गया है। उपलब्ध जल का उपयोग मितव्ययता के साथ करें। अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें कम वर्षा वाले क्षेत्र में नहीं लें। निर्यात उन फसलों का करें, जिनमें कम सिंचाई-जल प्रति इकाई उत्पादन में लगता है। धान की फसल लेने में एक किलोग्राम चावल के उत्पादन हेतु 3000 लीटर जल लगता है, अतः धान का निर्यात जल निर्यात करने के बराबर है।
ग्रामीण क्षेत्र का विकास : गाँवों में वे सब सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ जो शहरों में हैं। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षण, स्वास्थ्य सेवा में सुधार होगा, तो नवयुवक गाँव छोड़कर शहरों की ओर नहीं जाएँगे।
गाँवों में सहउद्योग : ग्रामीण क्षेत्र में सह उद्योगों से आय के साधन बढ़ें, उस हेतु शासन भी प्रयास कर रहा है। कृषि के सहउद्योग के रूप में पशुपालन, मछली पालन, कृषि उत्पादों, वन उत्पादन व औषधियों के प्रसंस्करण, ग्रेडिंग, पैकिंग, व्हेल्यू एडिशन, मशीनों का रखरखाव इत्यादि कई विकल्प हैं। कृषि में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) आधुनिक रूप से कृषि व्यवसाय को अपनाने हेतु प्रबंधन- एम.बी.ए. कृषि यांत्रिकी, मेडिकल्चर में शिक्षण, व्यवसाय-रोजगार की नई संभावनाओं से भरपूर है।
कृषि में निजी क्षेत्र : यह विडम्बना है कि निजी क्षेत्र विकास कर रहा है, जबकि शासकीय क्षेत्र की विश्वविद्यालय कृषि विस्तार विभाग व ग्रामीण विकास से संबंधित महकमों ने तो प्रायः अपनी सार्थकता है खो दी है, क्योंकि वे समय के साथ परिवर्तन करने में चूक गए।
इस अकर्मण्यता का शिकार मुख्य रूप से छोटे कृषक हो रहे हैं। विशेष आर्थिक जोन को निजी क्षेत्र के जुम्मे का निर्णय, क्या शासकीय विफलता को परिलक्षित नहीं कर रहा है। इस निर्णय के क्या परिणाम होंगे, वह तो समय बताएगा।
स्थानीय आदान : कृषि क्षेत्र में स्थानीय आदान, सदाबहार आर्गेनिक खेती के साथ में स्वदेशी बायो टेक्नोलॉजी आधारित व अन्य आदान उचित भाव पर उपलब्ध कराने हेतु शासन प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्था करता व कृषकों को मार्गदर्शन मिलता रहता तो कृषि घाटे का सौदा नहीं रहता व अन्नदाता संतुष्ट रहता। देश में कृषि की वृद्धि दर 3-4 प्रतिशत रहती तो अनाज के साथ में दलहन, तिलहन, में भी स्वावलम्बन सम्भव होता, साथ में गरीबी की रेखा से नीचे के लोग असंतुलित आहार-कुपोषण के शिकार नहीं होते।
पर्यावरण : पारिस्थितिकीय संतुलन को प्रभावित करने वाली रसायन आधारित सघन खेती अपनाने के कारण कई समस्याएँ उठ खडी हुईं। कृषक, शासन के प्रयासों के बाद भी आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है। कुछ आर्थिक राहत पर्याप्त सिद्ध नहीं हो रही है। गहरे अध्यन की जरूरत है। यह मानव निर्मित त्रासदी से निजात किस प्रकार पाया जाए, उस हेतु छोटी जोत पर, स्वयं के खेत पर स्वसाधनों से किए गए अनुसंधान व अन्य अनेक अनुसंधान, सर्वे सर्वेक्षण के निष्कर्ष को गंभीरतापूर्वक स्थान विशेष के अनुसार अपनाएँ।
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