सत्यमेव जयते की ताजी कड़ी शराब के नशे के खिलाफ तीखा संदेश लेकर आई। इतना तीखा कि नशे के आदी युवा भी सिहर से गए। नशा कैसे आपको धीरे-धीरे पीता है-कैसे आप इसकी गिरफ्त में आकर अपना सर्वस्व खो बैठते हैं, पत्रकार विजय सिन्हा के अनुभव से आरंभ 'सत्यमेव जयते' की आवाज युवाओं के मानस में सीधे उतरी। कैसे पत्रकार विजय सिन्हा नशे की वजह से अर्श से फर्श तक पहुंचे और फिर नशे से मुक्त होकर अपनी जिंदगी को फिर से खूबसूरत मोड़ दे सके, नशेबाजों के लिए यह कहानी प्रेरक हो सकती है।
शराब का नशा ना सिर्फ आपको बर्बाद करता है बल्कि आपके मासूम परिवार को भी छिन्न-भिन्न कर देता है। समूचे देश में यह एक ऐसी घिनौनी समस्या है जो लाखों परिवारों को बिना किसी दोष के अपार कष्टों की सजा दे रही है। नशे का सेवन ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान कहीं बाहर हमें खोजना है वस्तुत: यह भीतर की दुर्बलताओं से उपजी आंतरिक समस्या है जिसका समाधान भी भीतर से ही संभव है। जब आप स्वयं को अपनी ही बुराइयों के खिलाफ खड़ा करते हैं तो मजबूत कलेजा चाहिए। शराब जैसे जहर को हाथ में लेने से पहले एक बार बस यह सोचना है कि शराब हम नहीं पी रहे बल्कि शराब हमें पी रही है। हमें ही अपने आपको बचाना है।
लेकिन डॉ. आशीष देशपांडे शराब को लत नहीं बल्कि बीमारी मानते हैं। उनका सख्त मानना है कि अगर बीमारी हमारी है तो इलाज भी हमें ही कराना है। और इस इलाज की शुरूआत संकल्प से ही संभव है।
आमिर ने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे प्रदेश सरकारों को दिए गए अधिकारों की जानकारी दी जिन्हें शराब को अपने क्षेत्र में प्रतिबंधित करने का पूरा अख्तियार है।
सत्यमेव जयते के इस एपिसोड में मशहूर शायर जावेद अख्तर कम लफ्जों में शराब की गंदगी को बयां कर गए। जावेद ने बताया कि- मैंने 27 वर्षों तक शराब पी। लेकिन आज मैं मानता हूं कि शराब से ज्यादा घिनौनी वस्तु दूसरी नहीं। शराबी मुझे घिनौने, गधे और उल्लू लगते हैं। आज यूथ के बीच शराब ग्लैमर बन गई है जबकि वास्तविकता में शराब ग्लैमर से कोसों दूर है।
शराब के नशे के कई अनेक दुष्परिणामों में शामिल है नशे की हालत में गाड़ी चलाकर किसी नितांत बेगुनाह की जान से खेल जाना। इसी का शिकार हुआ करण आनंद जैसा किशोर। शायद करण के पिता की मार्मिक दास्तां भी कच्ची आयु के बच्चों को यह सबक दे सके कि शराब मस्ती और मजा नहीं जीवन भर की सजा भी हो सकती है।
सत्यमेव जयते की सामाजिक सुधार के उद्देश्य की शुभता पुन: काबिले तारीफ है वरना एपिसोड बिखरा-बिखरा सा लगा। एक सी शुरुआत और एक सा अंत भी सहनीय है लेकिन कार्यक्रम की गुंथन का नयापन या कहें कि बुनावट का सधा होना सामान्य दर्शकों की दृष्टि से अब जरूरी हो चला है।