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पहला सवाल है कि लोकपाल की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब किस ओर जाएगा, क्या इस आंदोलन की मौत हो गई है? क्या फीके पड़ते आंदोलन से घबरा कर आनन फानन में यह निर्णय लिया गया है?

दूसरा सवाल है कि माना कि अन्ना खुद इस समर में नहीं उतरेंगे पर क्या यह बात टीम अन्ना के दूसरे सदस्यों पर भी लागू होती है? 'योग्य उम्मीदवारों' का चुनाव कैसे किया जाएगा?

तीसरा सवाल है कि टीम अन्ना की नजर में राजनीतिक विकल्प और राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी में क्या अंतर है?

PTI
क्या टीम अन्ना के सदस्य सड़क की लड़ाई को संसद में ले जाने के लिए खुद कोई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे या किसी मौजूदा राजनीतिक पार्टी को समर्थन देंगे?

सबसे अहम सवाल है कि क्या टीम अन्ना का यह कदम सिर्फ 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हराने के लिए चौथा मोर्चा खड़ा करने का प्रयास है जैसा कि जेपी आंदोलन के समय हुआ था?

बहरहाल इस समय तो कांग्रेस का ही पलड़ा भारी दिख रहा है क्योंकि इस बात की संभावना कांग्रेस नेताओं ने पहले ही जता दी थी। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे पर चुटकी लेते हुए बाबा रामदेव को भी नसीहत दे डाली है।

दिग्विजय सिंह ने अन्ना द्वारा राजनीतिक विकल्प का स्वागत करते हुए ट्वीट किया कि वैसे तो बाबा रामदेव ठग हैं। लेकिन उन्हें अन्ना से सीख लेनी चाहिए। बाबा रामदेव या तो अपनी पार्टी बनाएं या फिर अन्ना की पार्टी शामिल हो जाएं।

अब यह तो समय ही बताएगा कि इस कदम से अन्ना अपना मकसद हासिल कर पाते हैं या अन्ना को यह निर्णय लेकर कोई पछतावा होता है...
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