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केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बुधवार को समलैंगिक संबंधों को अत्यंत अनैतिक और सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ करार देते हुए इन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने का उच्चतम न्यायालय में कड़ा विरोध किया।

मंत्रालय की ओर से पैरवी कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने दलील दी कि भारतीय समाज अन्य देशों से भिन्न है और यह विदेशों का अनुकरण नहीं कर सकता।

मल्होत्रा ने न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी तथा न्यायमूर्ति जे. मुखोपाध्याय की पीठ के समक्ष तर्क दिया कि समलैंगिक संबंध बहुत अनैतिक तथा सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ हैं और इस तरह के कृत्यों से बीमारियां फैलने की आशंका ज्यादा होती है।

उन्होंने कहा कि हमारा संविधान अलग है और हमारी नैतिकता तथा हमारे मूल्य भी दूसरे देशों से भिन्न हैं, इसलिए हम उनका पालन नहीं कर सकते। समलैंगिक संबंधों को समाज द्वारा अस्वीकार किया जाना इन्हें अपराध की श्रेणी में रखने का पर्याप्त आधार है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले का विरोध करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भारतीय समाज समलैंगिकता को अस्वीकार करता है और कानून समाज से अलग नहीं चल सकता।

उच्च न्यायालय ने 2009 में दिए अपने फैसले में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। भादंसं की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) समलैंगिक संबंधों को अपराध मानती है जिसके तहत अधिकतम सजा उम्रकैद हो सकती है। (भाषा)
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