पद्मावती के नाम एक मार्मिक पत्र

प्रिय पद्मावती,
सादर प्रणाम। संभवत: सात सौ साल बाद ये पहला ही पत्र है, जो किसी ने आपको लिखा होगा। संजय लीला भंसाली नाम के एक कारीगर हैं। वे फिल्में बनाते हैं। इतिहास के किरदारों पर उम्दा फिल्में बनाई हैं। इस बार आप पर उनकी फिल्म आने वाली है। इसके बहाने आप बहस का विषय बन गई हैं। दो बातें आपसे करने का मन हुआ।

कभी सोचता हूं कि जब आप श्रीलंका से चित्तौड़ आईं होंगी तो भारत के बारे में क्या सपने आपकी आंखों में रहे होंगे। भारत का परिचय आपको गौतम बुद्ध से ही रहा होगा। समृद्धि और शांति का मुल्क, जहां से तथागत का विचार आज से 23 सौ साल पहले महेंद्र और संघमित्रा श्रीलंका लेकर गए थे। वे मगध सम्राट अशोक की संतान थे। मगर जब आपने चित्तौड़ का रुख किया तब तक महेंद्र-संघमित्रा की कहानी 16 सौ साल पुरानी हो चुकी थी। यहां छह सौ साल से कुछ और ही पक रहा था, जिसकी लपट आपके ही सामने चित्तौड़ को छूने वाली थी। जीते-जी जलती आग में अपने ऐसे अंत के बारे में आपने शायद ही कभी सोचा होगा!
आपके आने के सौ साल पहले ही चित्तौड़गढ़ से 500 किलोमीटर के फासले पर तब दिल्ली हैवानियत का ज्वालामुखी बन चुकी थी, जिसका लावा पूरे भारत को अपनी चपेट में ले रहा था। भारत वीरों की भूमि ही थी मगर वे ऐसे जाहिल युद्ध के आदी नहीं थे, जिसमें कोई नियम-कायदे नहीं थे। धोखा, छलकपट, बेरहमी ही जिनके उसूल थे। अरब की रेतीली हवाओं में पला एक कबीलाई विचार जहां से गुजरा था, उसने सब कुछ जलाकर राख कर डाला था। आपके समय चित्तौड़ का सामना जिस खिलजी से हुआ, वह उसी खूनी जोश से भरा हुआ था। तब तक दिल्ली पर कब्जा हुए सौ साल हो चुके थे। खिलजी को खेलने के लिए खुदा ने बीस साल दिए। 1296 से 1316 के बीच ये बीस साल भारत की बदकिस्मती के भी बीस साल थे।
हमें सत्तर साल पहले की बातें भी याद नहीं रहतीं। आपके और हमारे बीच तो 714 साल का फासला है। हम भारतीय भूलने में माहिर हैं। यूं दुनिया-जहां की जानकारियां होंगी मगर हमें अपने आसपास के इतिहास का कोई पता ही नहीं है। इतिहास के नाम पर अजीब किस्म की बेखबरी है या दूसरों के सुनाए कुछ किस्से-कहानियां हैं बस। वो भी सबके अपने नजरिए के हिसाब से। यहां इतिहास को तोड़मोड़ कर अपनी मनमर्जी लायक बनाकर परोसने की पूरी आजादी रही है। वैसे आपसे बेहतर कौन बता सकता है कि अतीत में याद रखने लायक बचा ही क्या था हमारे पास? कब्जा, कत्लेआम, लूटमार यही था।
आपने 1299 में राजस्थान के ही रणथंभौर में हुए अलाउद्दीन के हमले और औरतों के जौहर के किस्से सुने होंगे। पता नहीं आपके दिल पर तब क्या बीत रही होगी! चित्तौड़गढ़ में उस दिन आपने अपने जीवन का सबसे कठिन फैसला लिया और अपनी अनेक सखियों के साथ चिता की आग की तरफ कदम बढ़ाए। चंद घंटों में सब तबाह हो गया था। आप एक आंसू बनकर भारत की आंख से लुढ़क गईं। उन हालातों में उस धधकती आग में औरतों की सामूहिक आत्महत्याओं को आज हम जौहर के नाम से जानते हैं। आपका जौहर अंतिम नहीं था। चित्तौड़ में ही अगले ढाई सौ साल में और जौहर हुए। हर बार किसी सुलतान या बादशाह के हमले के बाद हारने के हालात में औरतों को अपनी इज्जत बचाने का यही एक रास्ता बचा था।
मध्यप्रदेश में चंदेरी और रायसेन के जौहर भी इतिहास में हैं। चंदेरी और रायसेन के रिश्ते चित्तौड़ राजघराने से तब बहुत गहरे थे। मेवाड़ ने तो अपनी घायल स्मृतियों में आपकी यादों को एक दीये की तरह जलाकर रखा, लेकिन यहां शायद ही किसी को याद हो कि पद्मावती की तरह चंदेरी में राजा मेदिनी राय की रानी मणिमाला और रायसेन के राजा सलहदी की रानी दुर्गावती ने भी अपने नाते-रिश्तेदारों, मंत्रियों, सेनापतियों की औरतों के साथ जौहर किए थे। आपको जानकर दुख होगा कि रायसेन की रानी दुर्गावती चित्तौड़गढ़ के ही राणा सांगा की बेटी थीं। चित्तौड़ से वे डोली में विदा हुई होंगी। मगर अपने सम्मान की खातिर जीते-जी सामूहिक चिता में उतर जाने की शक्ति उन्हें आपकी ही कहानी से मिली होगी! सांगा और बाबर के बीच की जंग में सलहदी भी सांगा की सेना में शामिल थे।
आपके बाद जैसे भारत राख और धुएं की एक भयावह कहानी है। कभी सोचता हूं कि उस क्षण चित्तौड़, चंदेरी या रायसेन के राजमहलों में क्या-कुछ घट रहा होगा, जब यह सूचना मिली होगी कि हम युद्ध हार गए हैं। कभी भी अलाउद्दीन, बाबर या सूरी की फौजें किले में दाखिल हो सकती हैं। महलों में मातम छा गया होगा। जैसे दिवाली के सारे दीये अचानक बुझ जाएं। जान बचाने के लिए आप इंतजार कर सकती थीं। होता क्या? अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ को बेरहमी से लूटता और महीनों की मशक्कत से हासिल इस फतह की पूरी कीमत वसूलता। बेशक इस लूट में आप और बाकी सारी औरतें-बच्चियां भी शुमार होतीं। आपके साथ जितनी भी औरतें उस दिन चित्तौड़ में रही होंगी, वे सब खिलजी के फौजियों में बांट दी जातीं। चित्तौड़ के महल से निकालकर आप सबको सामान की तरह ढोकर दिल्ली ले जाया जाता। दिल्ली के अपने महलों में आप माले-गनीमत की नुमाइश में पेश की जातीं।
आखिरकार खिलजी के हरम में आप बाकी जिंदगी, अपने जैसी ही दूसरी सैकड़ों औरतों के साथ गुजारतीं, जो ऐसी ही लूट में भारत के कोने-कोने से लाई गईं थीं। आपकी मुलाकात गुजरात के राजा करण की रानी कमलादी से भी होती और आप कमलादी की बेटी देवलरानी को भी देखतीं। पता नहीं आपको कैसा लगता यह देखकर कि अलाउद्दीन ने कमलादी को खुद रखा और उसकी बेटी देवलरानी का निकाह अपने बेटे खिज्र खां से करा दिया।
बची हुई जिंदगी में अपनी आन-बान और शान के मिट्‌टी में मिलने तक की कहानियां आप एक दूसरे को सुनातीं, कुछ बच्चे पैदा होते और एक दिन किसी अंधेरी कब्र में जाकर दफन हो जातीं। कमलादी और देवलदेवी के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम। तो किसे पता चलता कि पद्मावती कहां गईं, उसका क्या हुआ? पद्मावती इतिहास के अंधेरे में खो गई होती। मगर ऐसा नहीं हुआ। खिलजी की फतहें इतिहास में दर्ज हैं मगर सात सदियों के पार पद्मावती भी आंखों में झिलमिलाती है।
चित्तौड़ की आग में भस्म होने के साथ ही आसमान पर गाढ़े धुएं की काली परत छा गई थी। आप चित्तौड़ के आसमान से भारत के दामन में गिरा एक आंसू हैं। सात सौ साल बाद वो आंसू कई सवालों के साथ सामने है। मगर हम सवालों से बचने वाले लोग हैं। फिर एक अकेला पद्मावती का ही प्रश्न होता तो निपट भी लेते। देश का दामन ऐसे अनगिनत आंसुओं से भरा है। आपके साथ जलकर मरीं कितनी औरतों के नाम हमें याद हैं? मणिमाला और दुर्गावती के साथ सामूहिक आत्महत्याएं करने वालीं कितनी औरतों के नाम किसे पता हैं? और उन औरतें के बारे में क्या, जो आपकी तरह जौहर के फैसले नहीं कर सकीं और अपना सब कुछ बरबाद होने के बाद लूट के माल में शामिल होकर सुलतानों-बादशाहों के हरम में समाती रहीं?

यह इतिहास से गिरते आंसुओं की अंतहीन झड़ी है, जिस पर किसी भी इज्जतदार कौम को पश्चाताप और शर्म से भरा होना चाहिए। आपको याद करते हुए मेरा सिर शर्म से झुका है। दिल दर्द से भरा है। दिमाग बेचैन है। आप इतिहास का मरा हुआ हिस्सा नहीं हैं। आप जीवित स्मृति हैं। आप हमारी आंखों की नमी में हैं।

अलाउद्दीन खिलजी हो, तुगलक हो, तैमूर हो, बाबर हो, औरंगजेब हो या नादिर शाह। तवारीख में इन सबने खुद को इस्लाम का अनुयायी होने का दावा बड़े जोर से कराया है। मैं नहीं मानता कि ये मामूली मुसलमान भी थे, क्योंकि मुझे तो यह बताया जाता है कि इस्लाम का मतलब ही है-शांति! अमन का संदेश देने वाले मजहब में ऐसे क्रूर किरदार, जो जिंदगी भर कत्लेआम, लूटमार करते रहे और काफिरों के कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाकर गाजी का तमगा टांगते रहे। ये कम्बख्त कैसे मुसलमान हो सकते हैं? ये भारत के इतिहास के सबसे बड़े गुनहगार हैं।
मुझे नहीं पता संजय लीला भंसाली के सिनेमा में क्या है? मगर मैं जानता हूं कि आज किसी की हिम्मत नहीं कि सच को सच की तरह दिखा दे। कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी भंसाली की फिल्म का विरोध किया है। उनकी दलील दिलचस्प है। वे फरमा रहे हैं कि पद्मावती में मुसलमानों की छवि खराब की गई है। देखिए तो उन्हें अलाउद्दीन में एक मुसलमान दिखाई दे रहा है?

कभी सोचता हूं कि युद्ध हारने के बाद राजे-रजबाड़ों की जो काफिर औरतें इन सुलतानों-बादशाहों और उनके बाकी फौजियों के हिस्से में गई होंगी, उनकी औलादें और उन औलादों की औलादें आज कहां किस रूप में होंगी? वे जो जोर-जबर्दस्ती या लालच से धर्मांतरित हुए होंगे, उनके बच्चे और उनके बच्चों के बच्चे आज कहां और कैसे होंगे, क्या कर रहे होंगे? उनकी याददाश्त में क्या होगा? और आज जो हैं, वे कैसे महमूद, अलाउद्दीन, तुगलक, तैमूर, बाबर और औरंगेजब से अपना रिश्ता जोड़ सकते हैं। वे भी तो इनके पुरखों को दिए जख्मों के जीते-जागते, चलते-फिरते सबूत हैं।
इस्लाम के नाम पर सदियों तक लूटमार और कत्लेआम करते रहे इन सुलतानों-बादशाहों से परेशान पुरखे हम सबके एक ही थे। जरूरत है कि ये अपनी याददाश्त पर जोर डालें। तारीख के पन्ने पलटें। अपने दानिशमंदों से मशविरा करें, सवाल पूछें-हम कौन हैं, हमारे पुरखे कौन थे? वे जो यहां हमले करने आए या वे जिन पर हमले हुए और मरते-कटते रहे, जलील होते रहे। अपनी जातीय स्मृति को जगाएं। सच का सामना करें!

अब कुछ नहीं हो सकता। आपके जौहर के बाद इस जमीन पर बहुत कुछ घटा है। यह देश तीन टुकड़ों में बटा है। आप आकर देखें तो हैरान होंगी। अब हम यहां बहुसंख्यक हैं। हम ही अल्पसंख्यक हैं। जबकि आपके समय तक हम काफी कुछ एक ही थे। मगर हमारी याददाश्त कमजोर हैं। हमें पता ही नहीं कि हमारी बेकसूर मां-बहनों के साथ क्या हुआ? कौन कहां से आया और हमारे साथ क्या खेल कर गया? हम जो बहुसंख्यक हैं, वे आपकी कहानी से आहत महसूस करते हैं। हम जो अल्पसंख्यक हैं, वे अलाउद्दीन को अपना समझते हैं। आशा है आप हमारी भूल को माफ करेंगी।
प्रिय पद्मावती हमें विश्वास है आप स्वर्ग में ही होंगी। आप धरती पर मत आइएगा। यहां कुछ भी नहीं बदला है। भारत में लौटकर आपको दुख ही होगा।
उत्तर की प्रतीक्षा है।

आपका ही-
विजय मनोहर तिवारी

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