क्या नेताजी की रहस्यमय मौत से कभी उठ पाएगा पर्दा?

नई दिल्ली| पुनः संशोधित रविवार, 19 अप्रैल 2015 (12:13 IST)
नई दिल्ली। भारतमाता के अमर सपूत नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कुछ दस्तावेजों के अंश सामने आने के बाद देशवासियों के मन में एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनकी रहस्यमयी मौत से निकट भविष्य में पर्दा उठ पाएगा?
नेताजी की मात्र 48 वर्ष की उम्र में 18 अगस्त 1945 को ताईवान के फोरमोसा में एक विमान दुर्घटना में मौत होने की बात कही गई है। इसकी जांच के लिए सरकार अब तक 3 आयोग गठित कर चुकी है। आजादी से पहले भी गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने एक जांच समिति गठित की थी, लेकिन उनकी मौत के रहस्य से आज तक पर्दा नहीं उठ पाया है।> > नेताजी की मौत को लेकर देश में कई तरह की किंवदंतियां बन चुकी हैं। नेताजी से जुड़ी कुछ फाइलें सरकार के पास हैं जिन्हें वह यह कहकर सार्वजनिक करने से इंकार करती रही है कि ऐसा करने से मित्र देश के साथ संबंधों पर असर पड़ सकता है।
इस फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग एक बार फिर उठी है। लेकिन उनके सार्वजनिक होने से भी क्या यह पता चल पाएगा कि वाकई नेताजी उस विमान दुर्घटना में मारे गए थे या साइबेरिया की जेल में भेज दिए गए थे? या गुमनामी में बाबा के रूप में भारत में आजादी के बाद जीवन व्यतीत करते रहे।

मोदी सरकार ने सरकारी गोपनीय फाइलों को सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक करने पर विचार करने के लिए एक समिति गठित कर दी है और गत दिनों उसकी पहली बैठक भी हो चुकी है।

पिछले दिनों मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में लंबे समय तक गुप्तचर ब्यूरों के लोग नेताजी के परिजनों की जासूसी करते रहे। इससे लोगों की यह भावना मजबूत हुई है कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मौत नहीं हुई थी।

ब्रिटिश भारत में ही लॉर्ड माउंटबेटन ने इसकी नेताजी की मौत की जांच के लिए सर कर्नल जॉन फिग्स को नियुक्त किया था और 25 जुलाई 1946 को उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी पेश की पर वह सार्वजनिक नहीं की गई।

यहां तक कि 1977 में ब्रिटिश लाइब्रेरी में जब भारतीय दस्तावेजों को सार्वजनिक किया गया तो उसमें भी फ्रिग्स की रिपोर्ट नहीं थी, लेकिन बाद में ब्रिटिश लायब्रेरी को उस रिपोर्ट की फोटोकॉपी मिली जिसमें नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत की बात कही गई थी, लेकिन इससे भी लोगों के मन का संदेह नहीं गया था।

आजादी के बाद जब नेताजी की मौत को लेकर अफवाहे फैलीं तो सरकार ने आजाद हिन्द फौज में लेफ्टिनेंट कर्नल रह चुके शाह नवाज खान की अध्यक्षता में 1956मे 3 सदस्यीय आयोग गठित किया जिसमें आईसीएस अधिकारी एसएन मैत्रा तथा नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस भी सदस्य थे।

इस समिति के 2 सदस्यों ने माना कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में हुई थी, पर सुरेश चंद्र बोस ने यह कहकर जांच आयोग की अंतिम रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था कि आयोग ने कुछ महत्वपूर्ण सबूतों को उनसे छिपा लिया ताकि रिपोर्ट में नेताजी की मौत का कारण विमान दुर्घटना बताया जाए।

नेताजी के भाई का यह भी कहना था कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री विधानचंद्र राय तथा जांच आयोग के अन्य सदस्यों ने भी अंतिम रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए उन पर दवाब डाला था।

इसके 14 साल बाद 1970 में नेताजी की मौत को लेकर विवाद फिर गहराया, क्योंकि रूस के नेता ख्रुश्चेव ने भी तब कहा था कि पंडित नेहरू के अंतिम संस्कार में नेताजी भी आए थे। 1970 में पंजाब उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश जीडी खोसला की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। उसने 1974 में रिपोर्ट दी थी और उसने पिछली रिपोर्टों को सही माना।

इसके बाद 1999 में अदालत के निर्देश पर वाजपेयी सरकार ने उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश एमके मुखर्जी को नेताजी की मौत की जांच करने को कहा।

मुखर्जी आयोग जापान, रूस तथा ताईवान भी गया। उसने 8 नवंबर 2005 को रिपोर्ट दी कि नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत होने का कोई प्रमाण नहीं है और जापान के रेंकोजी मंदिर में उनकी जो अस्थि रखी गई थी, वह दरअसल जापान के एक सैनिक की थी।

यह रिपोर्ट 17 मई 2006 को संसद में पेश भी की गई, पर सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया लेकिन न्यायमूर्ति मुखर्जी बाद में भी अपनी बात पर अडिग रहे।

संप्रग सरकार के दौरान सुभाष अग्रवाल नामक एक सामाजिक कार्यकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक कर की जानकारी मांगी तो सरकार ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। मुखर्जी आयोग ने भी नेताजी संबंधित गोपनीय फाइलें नहीं देखी थीं।

अब नेताजी की मौत को लेकर फिर विवाद खड़ा हुआ है। देश की जनता के मन में यह सवाल एक बार फिर उठ खडा हुआ है कि क्या मोदी सरकार नेताजी की रहस्यमय मौत से पर्दा उठाएगी या यह सारी कवायद केवल राजनीति का ही हिस्सा बनकर रह जाएगी?

इस पूरे प्रसंग में नेताजी का कद जनमानस में लगातार बढ़ता गया है और इतिहास में नए सिरे से उनके मूल्यांकन की भी जरूरत महसूस की जा रही है। (वार्ता)




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