गोपालकृष्ण गांधी को इतनी दया क्यों आती है

Author सुशोभित सक्तावत|
जिस दिन गोपालकृष्ण गांधी को अठारह विपक्षी दलों की "अक्षौहिणी" सेना ने सर्वसम्मति से उपराष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार चुना, उसी दिन से जैसे तय हो गया था कि याक़ूब मेमन किसी भी दिन अपनी क़ब्र में बाहर निकलकर आ जाएगा।
और वैसा ही हुआ। सोमवार को शिवसेना ने गोपालकृष्ण गांधी के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। वर्ष 1993 के नृशंस मुंबई धमाकों के मामले में दो साल पहले याक़ूब को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। तब इस आतंकवादी के पक्ष में देश की वामधारा के चिंतकों और उदारमना बौद्ध‍िकों में जैसी सहानुभूति की लहर देखी गई थी, उसने एकबारगी देशवासियों को हतप्रभ कर दिया था। याक़ूब की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को भी अदालत खुलवाई गई थी।
कहते हैं कि भारत के पतन की नींव दिल्ली के अंतिम राजपूत सम्राट ने अपनी भलमनसाहत से तब रख दी थी, जब उन्होंने सोलह बार मुस्ल‍िम आक्रांता मोहम्मद ग़ौरी को अभयदान दिया था। सत्रहवीं बार में ग़ौरी चौहान को परास्त करने में क़ामयाब रहा और उसके बाद दिल्ली हिंदुओं के हाथ से ऐसी फिसली कि वे उसे फिर हासिल करने में क़ामयाब नहीं हो सके।

भारत को एक सॉफ़्ट स्टेट अकारण ही नहीं कहा जाता है। और अलबत्ता अनेक लोग भारत को हिंदुओं का देश कहे जाने पर आपत्त‍ि दर्ज कराने लग जाएंगे, लेकिन सच तो यही है कि भारत की मुलायमियत वास्तव में हिंदू जाति में निहित कोमलता का ही रूपांतरण है।

हिंदू द्वेष नहीं रखते, बहुत जल्दी अतीत को भुला देते हैं, सौहार्द उनका धर्म है, दुनिया को एक कुटुम्ब मानते हैं, अतिथि का मन से सत्कार करते हैं और शत्रु को अभयदान दे देते हैं।

ऐसे में अगर उनका पाला दुर्दम्य शत्रुओं से पड़ जाए, तो उसका संघर्ष करने की हिंदुओं की क्षमता हमेशा ही प्रश्नांकित रहती है।

जिन लोगों ने याक़ूब मेमन को अभयदान देने की मांग की थी, उनमें गोपालकृष्ण गांधी अग्रणी थे। 2012 में वे स्वयं राष्ट्रपति पद की दौड़ में रह चुके थे और आज वे उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी हैं, लेकिन 2015 में उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को चिट्ठी लिखकर याक़ूब को अभयदान देने का अनुरोध किया था।
गांधी ने चिट्ठी में लिखा था कि याक़ूब को अभयदान देना पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के प्रति हमारी आदरांजलि होगी। मुझे नहीं मालूम इस बात का क्या मतलब है। कहां भारत के गौरव कलाम साहब और कहां देश का अपराधी वह हत्यारा। तब इस बात की भी क्या तुक है कि दोनों ही मुसलमान थे। यह तो उल्टे कलाम साहब का अपमान हुआ।

लेकिन गोपालकृष्ण गांधी की अपनी समस्याएं हैं। राजनीतिक उतनी नहीं, जितनी कि मनोवैज्ञानिक। महात्मा गांधी के वे पोते हैं और उनकी मुखाकृति में बहुधा गांधी की झलक दिख जाती है। ऐसे तो वे सी. राजगोपालाचारी के नाती भी हैं, लेकिन जान पड़ता है कि उनके भीतर नाना के बजाय दादा के ही डीएनए अधिक हैं। गांधी के घर में जन्म लेने और जीवनभर कांग्रेस के परिवेश में जीवन बिताने का मतलब कुछ ऐसी वैचारिक रूढ़ियां होती हैं, जिनसे पार पाना कठिन है। गोपालकृष्ण गांधी के भाई राजमोहन गांधी भी इससे मुक्त नहीं हो सके हैं, जो आम आदमी पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं और भारतीय मुस्ल‍िमों के प्रति एक सदाशय पुस्तक लिख चुके हैं।
लेकिन अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो मुस्ल‍िम आतंकवादियों के प्रति इतनी नरमी दिखाए जाने की क्या वजह है। हिंदू चरमपंथियों के प्रति तो वैसी कोई नरमी उदारवादियों की तरफ़ से नहीं दिखाई जाती, उल्टे उनके प्रति एक घृणा ही बराबर उनके विचारों में झलकती है।

गोपालकृष्ण गांधी पूर्व राजनयिक होने के साथ ही लेखक-स्तंभकार भी हैं और उनके साथ मेरा रिश्ता स्तंभकार और संपादक वाला रहा है। मेरे मन में गोपाल गांधी के अनेक संस्मरण हैं।
गोपाल गांधी बहुत शाइस्ता तबीयत के शख़्स हैं। जैसा कि कहते हैं, "पुराने चलन के आदमी"। पुराने लोगों में "आत्मक्षोभ" का जो अविकल भाव बना रहता था, वह भी उनमें बराबर है। नेक, ख़ुदमुख़्तार, ज़हीन, आत्मलोप की हद तक विनयशील और घोर गांधीवादी। गांधीवाद उनके डीएनए में है। गुजराती उनकी मातृभाषा है। अभी मद्रास में रहते हैं, जो कि उनका ननिहाल है। बंगाल के वे राज्यपाल रहे, जब वे बहुधा सामान्यजन की तरह बांग्ला ग्रामभूमि की सैर पर निकल जाया करते थे। इस तरह हिंदी, गुजराती, तमिल और बांग्ला भाषाएं वे बोल लेते हैं और "सेंट स्टीफ़ेनियन" होने के कारण अंग्रेज़ी तो ख़ैर माशाअल्ला है ही। फिर भी उनका दिल सबसे ज़्यादा लगता है उर्दू मिश्र‍ित "हिंदुस्तानी" में।
गोपालकृष्ण गांधी मूलत: एक नेक इंसान हैं, दिक़्कत यही है कि वे कट्टर "सेकुलर" भी हैं।

दो तरह के "सेकुलर" होते हैं : एक तो धूर्त क़िस्म के, जैसे कि सेकुलर बुद्धिजीवी और राजनेता, जो कि अर्धसत्यों का अपने पक्ष में दोहन करते हैं और चुनी हुई चुप्प‍ियां अख़्‍ति‍यार करते हैं। दूसरे होते हैं भलमनसाहत वाले "सेकुलर"। भाईचारे में यक़ीन रखने वाले, इतिहास में सामुदायिक टकरावों की वृत्त‍ि को देखने से इनकार करने वाले, हर क़ीमत पर अम्नो-चैन के हिमायती। गोपालकृष्ण गांधी दूसरे वाले "सेकुलर" हैं और चुनी हुई चुप्प‍ियां उनका क़ायदा नहीं है।

जब वे बंगाल के राज्यपाल थे तो वहां की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार को लगातार फटकारते रहते थे। जबकि इधर अटल बिहारी वाजपेयी की अभ्यर्थना में एक पूरा लेख वे लिख चुके हैं। अलबत्ता नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति उनका रवैया प्रारंभ से ही प्रतिकूल रहा है। वे जन्मना कांग्रेसी ठहरे। भारतीय राष्ट्र-राज्य का गांधीवादी-नेहरूवादी प्रवर्तन उनके गोत्र में है।
गोपालकृष्ण गांधी के मनोनयन के बाद जो विवाद सामने आया है, वह अवश्यंभावी ही था। जो व्यक्त‍ि आतंकवादियों के बचाव के लिए राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख सकता है, वह स्वयं एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बैठने के बाद क्या करेगा, कल्पना ही की जा सकती है। फिर चाहे इसके पीछे उनकी नेकनीयती ही क्यों ना हो।

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