चंद्रास्वामी : ताज बनाने वाली शख्सियत का बेनूर आखिरी वक्त

Author उमेश चतुर्वेदी|
20वीं सदी का आखिरी साल बीत चुका था। 21वीं सदी के पहले महीने में जाड़ा लोगों की हड्डियां कंपाने लगा था, उन्हीं दिनों दैनिक भास्कर के तत्कालीन फीचर संपादक का अनुरोध अपने पास जब आया तो उस अनुरोध के रोमांच ने जाड़े की तासीर को दूर धकेल दिया। कुछ ही महीनों पहले जमानत पर रिहा हुए चन्द्रास्वामी से मिलने और उन पर एक फीचर लिखने का अनुरोध रोमांचकारी तो था ही।

चन्द्रास्वामी का विश्व धर्मायतन ट्रस्ट अपने घर के पास ही है इसलिए एक शनिवार की शाम ट्रस्ट के एक न्यासी विक्रम सिंह को फोन घुमा दिया। विक्रम सिंह इन दिनों भारतीय जनता पार्टी के उत्तरप्रदेश के फतेहपुर से विधायक हैं।

राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कारोबार और फिल्मी हस्तियों से घिरे रहने वाले चन्द्रास्वामी बेशक उन दिनों जेल से बाहर आ गए थे, लेकिन उनका प्रभामंडल निस्तेज-सा पड़ा था। ऐसे में किसी बड़े अखबार के रिपोर्टर का फोन आना भी चन्द्रास्वामी के लिए अपनी अहमियत सोचने या पूछताछ करने वाले लोगों की भीड़ की एकरस जिंदगी को तोड़ने का जरिया हो सकता था, लिहाजा वक्त मिलने में देर नहीं लगी।

वह रविवार की सर्दीभरी शाम थी। मेरे घर से चन्द्रास्वामी का ट्रस्ट महज 1 किलोमीटर की दूरी पर है। उनसे मिलने जाने के लिए घर से निकला तो देखता क्या हूं कि एक जाना-पहचाना चेहरा सफेद रंग की सियेलो कार लेकर खड़ा है। वह चेहरा जौनपुर से बहुजन समाज पार्टी से लोकसभा सदस्य बने धनंजय सिंह का बाद में सहयोगी बना। उसने मुझसे गाड़ी में बैठने का इसरार किया, तब मेरी पत्नी भी साथ थीं। जब उन्होंने सुना था कि मैं चन्द्रास्वामी का इंटरव्यू करने जा रहा हूं तो उनके चर्चे के चलते से उनसे मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाई थीं। बहरहाल, मैंने कार में बैठने से इंकार कर दिया और दिल्ली के कुतुब होटल के पीछे स्थित विश्वधर्मायतन पहुंच गया।
चन्द्रास्वामी उन दिनों तक भले ही निस्तेज हो चुके थे, लेकिन उनके ट्रस्ट के जिस रिसेप्शन पर कुछ साल पहले तक केंद्रीय मंत्रियों की भीड़ लगी रहती थी, वहां भले वैसे लोगों की भीड़ नहीं थी, लेकिन ऐसा नहीं कि लोग नहीं थे। हम अपनी बारी का वहीं बैठकर इंतजार करने लगे, तब तक विक्रम सिंह वहां पहुंच गए। वे हमें लेकर उस भवन के दूसरे तल स्थित चन्द्रास्वामी के निजी कक्ष में लेकर चले।

मैंने कई रिपोर्टरों को देखा है कि हस्तियों के सामने पहुंचते ही वे अपनी भूमिका भूलकर वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं, जैसा व्यवहार उस हस्ती विशेष से मिलने आए लोग, समर्थक या श्रद्धालु करते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पाता। चूंकि चन्द्रास्वामी धर्म-कर्म और तंत्र से जुड़ी हस्ती थे, लिहाजा उनके पैर छूने वाले लोगों की वहां कमी नहीं थी। स्वाभाविक था कि वे हमसे भी ऐसी ही उम्मीद करते इसलिए सीढ़ियां चढ़ते वक्त मैंने विक्रम सिंह को बता दिया था कि मैं पैर नहीं छू पाऊंगा और ऐसी उम्मीद मुझसे नहीं की जाए।
चन्द्रास्वामी के कक्ष में पहुंचते ही लोबान का जबरदस्त भभूका अपनी नाक में घुस गया। अपना जी कुछ-कुछ मितलाने लगा। चन्द्रास्वामी एक सिंहासननुमा आसन पर बैठे थे। दोनों पैर नीचे कालीन बिछी फर्श पर थे। उनके दाहिने पैर पर दो लोग अपना सिर रगड़ रहे थे, जबकि बाएं पैर पर एक सूटेड-बूटेड सज्जन अपना माथा रगड़ रहे थे।

चन्द्रास्वामी का मुंह अर्द्धउन्मीलित भाव में खुला था। जीभ थोड़ी-सी बाहर निकली-सी थी... उससे लग रहा था, मानो लार बाहर निकलकर अब टपका तो तब टपका। लोबान के धुएं से कमरा भरा हुआ था, कमरे में सामान्य रोशनी नहीं थी, बल्कि लाल रंग का एक टिमटिमाता-सा बल्ब मद्धिम रोशनी बिखेर रहा था। कुल मिलाकर माहौल पूरी तरह अतीन्द्रिय बनाने की कोशिश की गई थी। शायद तांत्रिक शख्सियत का प्रभामंडल प्रभावी बनाने के लिए अतीन्द्रिय माहौल जरूरी होता है।

बहरहाल, मुझे देखते ही चन्द्रास्वामी की बांछें खिल गईं। उन्होंने अपने पैरों पर लोट रहे तीनों लोगों को परे किया। वे बड़े कारोबारी या औद्योगिक साम्राज्यधारी लग रहे थे। उन्हें कमरे से बाहर किया। मुझे और मेरी पत्नी को मोढ़े जैसे गद्देदार बिन बैग बैठने के लिए दिए गए।

विक्रम सिंह ने मेरा परिचय चन्द्रास्वामी से कराया। औपचारिक बातचीत शुरू होती, तब तक चन्द्रास्वामी ने अपने एक सेवक को बुलाया और हमें प्रसाद देने को कहा। वह भागकर गया और पेड़े लेकर आया। चन्द्रास्वामी ने उससे पेड़े लेकर मुझे और मेरी पत्नी को दिया। लेकिन पता नहीं माहौल का असर था या उनकी देहभाषा का प्रभाव, मैंने पेड़े तो ले लिए, लेकिन खा नहीं पाया। एक बात और है, जब भी मैं किसी बड़ी हस्ती से मिलने जाता हूं तो अपनी मानसिक तैयारी में उससे प्रभावित न होने का पूरा संकल्प लेकर जाता हूं इसलिए जल्दी मैं किसी से प्रभावित नहीं हो पाता।

चन्द्रास्वामी तो खैर तांत्रिक थे तो उनसे डिटैच होने की अपनी तैयारी कुछ ज्यादा ही थी। लेकिन मुझे महसूस हुआ कि चन्द्रास्वामी ने मुझे प्रभावित करने की अपनी पूरी ताकत झोंक दी जिसके जरिए वे एलिजाबेथ टेलर जैसी हॉलीवुड की हस्ती, नरसिंहराव जैसे प्रधानमंत्री, अदनान खशोगी, पामेला बोर्डेस जैसी हस्तियों तक को प्रभावित करते रहे। एक दौर में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर तक उनके प्रभामंडल के असर में रहे।

बहरहाल, उनसे इंटरव्यू शुरू हुआ। मैंने पहला सवाल छोड़ा, जेल से बाहर आने के बाद आपकी जीवनचर्या कैसे गुजर रही है? उनका जवाब था, एक दिन सुबह से लेकर रात तक हमारे आश्रम में मेरे साथ ही रहिए, तब इस सवाल का जवाब कहीं ज्यादा अच्छे से मिल जाएगा।

‘जेल में आपने अपने पसंदीदा खाने को बहुत मिस किया होगा। अब क्या कर रहे हैं?’ चूंकि ऐसे सवाल पूछने की अखबार से ताकीद की गई थी, उनकी लाइफस्टाइल पर ही लिखने को कहा गया था इसलिए मैंने दूसरा सवाल छोड़ा।

‘मेरा तो पसंदीदा खाना इडली-सांभर और डोसा है। जेल में मैंने उसे बहुत मिस किया। उसका स्वाद ले रहा हूं लेकिन इसके लिए भी आपको मेरे साथ पूरा दिन गुजारना होगा।’ चन्द्रास्वामी का अगला जवाब था।

इसके बाद उनसे जेल की तकलीफों पर सवाल था। इस सवाल से उनके चेहरे की मुस्कान गायब हुई, लगा कि किसी ने उनके दुखते तंतु छेड़ दिए हैं और वे मौन हो गए। जेल से अदालती सुनवाई के लिए जब उन्हें दिल्ली पुलिस लाती थी तो उन्हें चोर-उचक्कों, उठाईगीरों आदि के साथ लाती थी। जेल से अदालत के रास्ते वे अपराधी चन्द्रास्वामी के साथ बुरा सुलूक करते। कभी दाढ़ी नोंच लेते तो कभी पीट देते तो कभी धकिया देते। जिस शख्स के सामने केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, अधिकारी, फिल्मी हस्तियां तक पानी भरती रही हों, उसके साथ ऐसा सलूक निश्चित तौर पर त्रासद ही रहा होगा।

जाहिर है कि इस सवाल का जवाब देने की बजाय चन्द्रास्वामी मौन ही रहे। उनसे राजनीति, धर्म आदि पर कई और सवाल किए गए। राजनीति पर तो उन्होंने बड़ी मार्मिक टिप्पणी की, ‘राजनीति चढ़ते सूरज को ही सलाम करती है। डूबता सूरज उसकी प्राथमिकताओं से दूर होता है।’ लेकिन दुर्योग रहा कि चन्द्रास्वामी पर वह फीचर कभी लिखा ही नहीं जा सका। तब एसाइन करने वाले फीचर संपादक बदल गए और वह फीचर धरा का धरा रह गया।

चन्द्रास्वामी से बतौर रिपोर्टर पहला साबका 1995 की चिपचिपी गर्मियों के बाद हुआ था। तब चन्द्रास्वामी जेल नहीं गए थे, अलबत्ता 'जनसत्ता' अखबार की एक रिपोर्ट के बाद तत्कालीन आंतरिक सुरक्षा राज्यमंत्री राजेश पायलट ने उन्हें गिरफ्तार करने के आदेश दे दिए थे। यह जानते हुए भी चन्द्रास्वामी की पहुंच उनके बॉस और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव से है। नरसिंह राव ने पायलट को मंत्रिमंडल से तो नहीं हटाया, अलबत्ता विभाग जरूर बदल दिया था और उन्हें पर्यटन मंत्रालय का प्रभार दे दिया था। उन दिनों चन्द्रास्वामी ने कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया स्थित संजय वन में यज्ञ कराना शुरू किया, राजेश पायलट ने उस यज्ञ को पर्यावरण के लिए नुकसानदेह बताते हुए उस पर पाबंदी लगा दी थी।

इन्हीं दिनों तत्कालीन जनता दल नेता आरिफ मोहम्मद खान ने चन्द्रास्वामी के खिलाफ प्रदर्शन करने का ऐलान किया। उनका कारवां नई दिल्ली से दक्षिण दिल्ली स्थित कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया के लिए चला, लेकिन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के चौराहे पर ही दिल्ली पुलिस ने उसे रोक लिया।

उन दिनों एक छोटे अखबार 'हिमालय दर्पण' में मैं काम करता था। उसके तत्कालीन ब्यूरो चीफ (अब स्वर्गीय) राकेश कोहरवाल ने इस घटना की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मुझे दी थी। तब जाकर पहली बार पता चला था कि चन्द्रास्वामी का ट्रस्ट मेरी किराए की रिहायश के कितने नजदीक है।

चन्द्रास्वामी से बाद में भी मुलाकातें होती रहीं। कुतुब पार्क में सुबह टहलते वक्त वे टकरा जाते थे। उनका जन्मदिन हर साल पूरे धूमधाम से मनाया जाता रहा। विक्रम सिंह की ओर से हमें भी निमंत्रण मिलता। दो बार उनके इसरार पर हम गए भी। तब उन्होंने चन्द्रास्वामी से अपनी मुलाकात भी कराई। उस मुलाकात में स्वामी दिखावटी गुस्से से भर उठते थे, ‘क्या भाई, आपको मुझसे मिलने का वक्त भी नहीं मिलता।’

उनके जन्मदिन में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव और भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा नेता और पूर्व में जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे सुब्रमण्यम स्वामी हर बार दिखते रहे। हजारों लोगों की भीड़ अलग से जुटती। कई फिल्मी हस्तियों को भी वहां आते देखा।

लाखूभाई पाठक धोखाधड़ी केस में जेल से बाहर आने के बाद चन्द्रास्वामी की जिंदगी में उनका जन्मदिन ही अकेला मौका था, जब कुछ रौनक आती थी अन्यथा दुनिया घूम चुके, प्रधानमंत्रियों को अपनी उंगलियों पर नचा चुके, कैबिनेट मंत्री बनवा चुके इस शख्स का आखिरी वक्त बेनूर ही रहा।
कुछ भी हो, चन्द्रास्वामी भारतीय राजनीति के इतिहास में एक हस्तक्षेपकारी शख्सियत के तौर पर नकारात्मक तरीके से ही सही, जरूर याद किए जाएंगे।

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