आलोक कुमार : दुष्यंत के साए से एक मुलाकात

Author जयदीप कर्णिक|
मुझे हमेशा लगता रहा कि एक अजीब-सा कर्ज़ है मुझ पर जी का। केवल मुझ पर ही क्यों, मंच से उनके शेर पढ़कर तालियाँ और ट्रॉफियाँ हासिल करने वाले हर वक्ता पर। एकदम से फिट बैठती थीं उनकी पंक्तियाँ और पूरी तकरीर को एक नया उरूज़ दे जाती थीं। तमाम वाद-विवाद स्पर्धाएँ दुष्यंत कुमार के बिना अधूरी थीं। कोई कलमकार समय की नब्ज़ पर इससे मज़बूत और क्या पकड़ रख सकता है कि जब आप चंद मिनटों में देश-समाज का हाल बयाँ करना चाहें तो उस कलमकार की पंक्तियों को आईना बना सकते हैं-
 
मैं इन बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं
 
जब दुष्यंत कुमार ये कहते हैं तो वो सूरत-ए-हाल को बयाँ करने के लिए बढ़िया ज़मीन आपको दे देते हैं। उर्दू-हिंदी की बेहतरीन जुगलबंदी के साथ जो मानीखेज़ बातें उन्होंने कहीं वो दरअसल हिन्दी ग़ज़ल के ख़ालीपन को भर रही थीं। आज़ादी के बाद के बदलते हिंदुस्तान को उन्होंने बेहतर अभिव्यक्ति दी, आसान लफ्ज़ दिए। चाहे पत्थर उछालकर आकाश में सुराख करने की ख़्वाहिश हो या नुमाइश में मिले चीथड़ों में लिपटे हिंदुस्तान की बात हो, सकारात्मकता और कड़वे यथार्थ के दोनों ही सिरे उन्होंने मज़बूती से पकड़ रखे थे। कड़वे यथार्थ से उपजे नैराश्य को भगाने के लिए वो बदलाव की चिंगारी लेकर भी तैयार मिलते थे।
 
बदलाव की उत्कट अभिलाषा को अभिव्यक्त करने के लिए तो ख़ैर उनकी ये पंक्तियाँ कालजयी हो चुकी हैं –
 
हो गई है पीर-पर्वत सी पिघलनी चाहिए, 
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, 
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
 
बहरहाल केवल दुष्यंत कुमार पर ही बहुत लंबी बात हो सकती है। पर जब से उनकी शायरी और कविता से परिचय हुआ, एक अजीब-सा राब्ता रहा। मुझे बहुत लंबे समय तक साये में धूप खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ी। कोई ऐसा दीवाना मिल ही जाता था जिसे सब कंठस्थ हो। जब उनके बारे में और जाना और पता चला कि वो तो अपने इस दुनिया में आने से पहले ही कूच कर गए हैं तो एक अनजान-सी ख़लिश कहीं अवचेतन में पड़ी हुई थी। इतने बरसों तक .... । जैसे ही पता चला कि दुष्यंत जी के सुपुत्र जी से बात-मुलाकात होने वाली है तो लगा शायद ख़लिश कुछ कम हो, कुछ कर्ज़ उतर जाए.... । 
 
बहुत सहज-सरल आलोक त्यागी, यानी आलोक कुमार से 15-20 मिनट की तय मुलाकात कब एक घंटे से ऊपर चली गई पता ही नहीं चला। आलोक कुमार दुष्यंत कुमार के सुपुत्र होने के साथ ही कमलेश्वर के दामाद भी हैं। साहित्य से यों दोतरफा गहरे जुड़ाव का सौभाग्य उनके व्यक्तित्व में भी बाआसानी झलकता है।   
उन्होंने बताया कि कैसे भोपाल में कॉलेज के दिनों में छात्र आंदोलन को लेकर दुष्यंत जी ने उनका समर्थन किया था। होस्टल से निकाले गए छात्रों का साथ देते हुए उन्होंने कुलपति से बात की थी।
 
आलोक बताते हैं कि भोपाल में उनके घर पर मेला सा लगा रहता था। दुष्यंत जी से मिलने वालों का इस कदर तांता लगा रहता था कि आलोक कुमार को होस्टल में रहकर पढ़ाने का निर्णय लिया गया ताकि पढ़ाई पर असर ना हो। दुष्यंत जी जब लिखते थे तो अपनी पत्नी को अपना लिखा हुआ सुनाकर पता करते थे कि बात उन तक पहुँची या नहीं। आलोक कहते हैं –“यही उनका पैमाना था। अगर अम्मा को बात अच्छी लगी, उन तक ठीक से पहुँची तो फिर सब तक ठीक से पहुँचेगी।“ – जाहिर है उनका ये पैमाना बिलकुल दुरुस्त ही था। क्योंकि आलोक कुमार जी की माताजी गृहणी होने के साथ ही स्कूल में हिन्दी की अध्यापिका भी थीं और एक जागरूक पाठकश्रोता का बेहतर प्रतिनि‍धित्व करती थीं। 
 
आलोक बताते हैं कि हाल ही में फिल्म 'मसान' को कान फिल्म समारोह में काफी सराहना मिली है। इस फिल्म में दुष्यंत कुमार की एक कविता का भी इस्तेमाल किया गया है, जिसे स्वानंद किरकिरे ने गाया है। 
 
एक जंगल है तेरी आंखों में
मैं जहां राह भूल जाता हूं
तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं
हर तरफ एतराज होता है 
मैं अगर रौशनी में आता हूं
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
अपने कितने करीब पाता हूं 
तू किसी रेल सी गुजरती है...
 
आलोक वैसे तो बैंक अधिकारी हैं पर साहित्य से जुड़ाव वहाँ भी बना हुआ है। वे स्टेट बैंक की आंतरिक पत्रिका के संपादन का कार्य देखते हैं। पर नौकरी से इतर भी उनके भीतर साहित्य के उस बीज का अंकुरण देखा जा सकता है जो उन्हें विरासत में मिला। बस पता नहीं क्यों वो इसको लेकर थोड़े संकोची हैं। उन्होंने बहुत आग्रह पर अपनी ये रचना हमें सुनाई..... 
पूरा जो आदमी हो वो आखिर नहीं मिला
धड़ मिल गया अगर तो यहां सर नहीं मिला
रिश्ते हैं आंच के या कि बुत हैं ये कांच के
ये साबुत हैं चूंकि संग या काफिर नहीं मिला
यारों की दोस्ती का यहां जिक्र क्या करें
उनसे गले मिले तो गला फिर नहीं मिला
हर हमसफर पर आज बस मंजिल का जुनूं है
हर डग का मजा ले वो मुसाफिर नहीं मिला
ये बदली हुई फिजा ये बदली हुई हवा
मेरी छत से गुजर गई
ये हसरत लिए हुए कि मैं बाहर नहीं मिला।
 
मैंने उनसे कहा कि ये दुर्भाग्य है कि हम दुष्यंत जी से नहीं मिल पाए। फिर आलोक जी से कहा कि उनकी कुछ रचनाएँ हमें सुना दें। उन्होंने सुनाई और ये भी कहा कि आवाज़ पिताजी सी बहुत मिलती है उनकी। फिर तो ये और आनंददायी अनुभव हो गया।
 
आलोक कुमार सौभाग्यशाली हैं कि उन्होंने स्व. राजेन्द्र माथुर, शरद जोशी और दुष्यंत कुमार को एक साथ देखा-सुना है। उन्होंने बताया आपातकाल के दौरान भी ये तीनों घर के आंगन में कुर्सी डाले लंबी चर्चा कर रहे थे। 
 
मुझे नहीं पता कि कर्ज़ कुछ कम हुआ कि नहीं पर हाँ, आलोक कुमार से मिलना यकीनन एक अच्छा अनुभव रहा।
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