ईंट के भट्टों से इंटरनेट के आकाश तक

कोमल हाथों से पहचान गढ़ते मजदूर बच्चे

मासूम खिलखिलाहट बनी रहे
स्मृति आदित्य| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (19:03 IST)
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बचपन यानी ठहाके,शरारतें, बेफिक्री और एक प्यारी-सी मुस्कान। लेकिन क्या नसीब है हर बच्चे को खुशियों के खिलखिलाते मोती, उमंगों का उजाला और नए युग के नए सपने? इस देश की विडंबना है कि यहाँ गरीबी और लाचारी के साये में पल रहे बच्चे उम्र में तो बच्चे ही हैं लेकिन हालात ने उन्हें इतना बड़ा बना दिया है कि वे बचपन की मासूम परिभाषा भूल गए हैं। घोर नकारात्मक परिस्थिति में भी इसी देश में कुछ बच्चे ऐसे अदभुत आधुनिक आयाम रच रहे हैं कि उनके साहस को सलाम करने को जी चाहता है।
शहर : कानपुर, स्थान : 'अपना घर', B-135/8, प्रधान गेट, नानकरी, आईआईटी कानपुर। एक छोटे से कमरे में 12 बच्चे 'बाल सजग' नाम से ब्लॉग अपडेट कर रहे हैं। बच्चों के लिए बच्चों का ब्लॉग। बदलते दौर में आज के हाईटेक बच्चे अगर ऐसा करें भी तो आखिर क्या चमत्कार है? लेकिन यह चमत्कार भी है, और एक पूरी की पूरी जाति की चौकसी का संके‍त भी।
दरअसल, के 'अपना घर' नाम से स्थापित बच्चों का यह समूह अभिजात्य वर्ग से नहीं आया है। ये बच्चे उच्च तकनीकी शिक्षा केन्द्रों या महँगे स्कूलों से नहीं आए हैं। यह बच्चे कानपुर में साल के हर नवंबर में आने वाले और जून में पुन: अपने ‍पिछड़े गाँव लौट जाने वाले प्रवासी मजदूरों के हैं।
यह बच्चे कल तक ईंट-भट्टों की झुलसती आँच में तप रहे थे, कल तक इनके हाथों में कठोर और गर्म ईंटों से हुए फफोले थे आज उन्हीं हाथों में माउस और की-बोर्ड है। अभिव्यक्ति का आधुनिक खुला आकाश यानी इंटरनेट है और भोले मन से निकली नन्ही-नन्ही कविताएँ है, छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। आइए इन्हें विस्तार से जानते हैं:

एक कदम प्रवासी मजदूरों के लिए कानपुर में शिक्षा पर आधारित आवासीय प्रोजेक्ट 'एक कदम' की शुरुआत हुई। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य प्रवासी मजदूरों के बच्चों का सर्वांगीण विकास और समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है। सामाजिक कार्यकर्ता विजया रामचन्द्रन व महेश कुमार ने आशा फॉर एज्यूकेशन ट्रस्ट के सहयोग से जुलाई 2006 में एक होस्टल की स्थापना की। 12 बच्चों के साथ यह शुभ 'कदम' आगे बढ़ा।

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