ऐसेे बिगाड़ा हमने पर्यावरण को...

पूरे विश्व में समान रूप से मनाया जाने वाला उत्सव कहें, दिवस कहें या फिर पुण्यतिथ‍ि... वर्तमान परिस्थिति के अनुसार मनुष्य ने का जो हाल किया है उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि साल में एक दिन मनाने और पौधे लगाने से, प्रकृति के प्रति किए गए मनुष्य के पाप कम नहीं हो सकते। बल्कि प्रकृति के स्वरूप को विकृत करने के पश्चाताप के रूप में हमें हर दिन हर समय पर्यावरण के प्रति संरक्षण की भावना को अपने जीवन में उतारना होगा अन्यथा इसकेे  परिणाम भी हम बगैर प्रकृति को कोसे, भुगतने को तैयार रहें।
माना कि विश्व स्तर पर के लिए कदम उठाए जा रहे हैं लेकिन इस पर हमें, समाज को और पूरे विश्व को चिंतन करने की आवश्यकता है कि ईश्वर ने हमें जो उपहार प्रकृति के रूप में दिया था, क्या हम उसे उसके मूल स्वरूप में बरकरार रख पाए।   
> अपने स्वार्थ साधने के लिए हमने कितनी बार इसके स्वरूप को विकृत किया। यही प्रकृति हमारी जीवनदायिनी प्राथमिकता थी जिसे हमने अन्यान्य स्वार्थ के लिए नजरअंदाज कर दिया और वर्तमान में इसके परिणाम भी भुगत रहे हैं। आइए, एक नजर डालते हैं हमारे स्वार्थ निहित कृत्यों पर ....
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