सब कुछ झूठा या सब कुछ सच्चा?

# माय हैशटैग
 
अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप सोशल मीडिया की बड़ी महारथी हैं। टि्वटर पर उनके करीब 25 लाख फॉलोअर हैं और इंस्टाग्राम पर करीब 20 लाख। हाल ही में उन्होंने अपने दोनों अकाउंट में एक-एक अकाउंट और जोड़ लिया और उसे अपना ऑफिशियल अकाउंट घोषित किया। उनका निजी अकाउंट एक गैर राजनीतिक अकाउंट होगा और दूसरा आधिकारिक।
इवांका, ट्रंप कॉर्प की उपाध्यक्ष हैं और ट्रंप कॉर्पोरेशन के तमाम विकास कार्यों और अधिग्रहणों की जिम्मेदारी संभालती हैं। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उनकी भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही थी। कहा जाता है कि इवांका का ट्रंप की निजी जिंदगी के साथ ही सार्वजनिक जीवन में भी काफी दखल है और वे कई देशों के उन राष्ट्राध्यक्षों से भी बात करती हैं, जिनसे केवल किसी देश का प्रमुख ही बात कर पाता है।
 
इवांका को भी मास मीडिया के साथ ही सोशल मीडिया से बहुतेरी शिकायतें हैं। ओबामा ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा था कि सोशल मीडिया पर या तो सब कुछ झूठा है या सब कुछ सच्चा। सोशल मीडिया के कंधे पर सवार होकर मास मीडिया अफवाहों को फैलाने का काम करता है। मीडिया का एक वर्ग यह मानता है कि हिलेरी क्लिंटन की हार में सोशल मीडिया की भूमिका बहुत बड़ी रही है। इसी तरह ब्रिटेन के लोगों में से एक वर्ग यह मानता है कि ब्रेस्ट्रिक्स के फैसले में भी सोशल मीडिया द्वारा फैलाई गई अफवाहों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। 
 
फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग इस तरह की बातों को बेबुनियाद बनाते हुए कहते हैं कि सोशल मीडिया पर फेक न्यूज प्रचारित करना आम बात है। इसी के साथ वे पिछले दिनों यह भी स्वीकार करते हुए लगे जब उन्होंने कहा कि हम बहुत दिनों से इस समस्या पर काम कर रहे हैं। इस समस्या से जुकरबर्ग का आशय सोशल मीडिया पर आ रही फेक न्यूज से था। ये फेक न्यूज शरारतपूर्ण होती है और इनका उद्देश्य सच्चाई को उजागर होने से रोकना होता है। 
 
सोशल मीडिया को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में जो सबसे बड़ी चिंता है, वह यह है कि सोशल मीडिया अफवाह फैलाने की मशीन बनता जा रहा है। यह बात और है कि कई लोग मास मीडिया को भी अफवाह फैलाने की मशीन ही समझते हैं, क्योंकि तमाम टीवी चैनल और प्रमुख अखबार किसी का भी पक्ष लेने में गुरेज नहीं करते। कुछ दिनों पहले लंदन विश्वविद्यालय के छात्र संघ ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें लंदन के प्रमुख अखबार सन, डेली मेल और डेली एक्सप्रेस को कैंपस में लाने पर रोक लगाने की बात थी।
 
विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे करीब 500 विद्यार्थी हैं, लेकिन उनमें से केवल एक विद्यार्थी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था, इससे जाहिर है कि आम लोगों के मन में मास मीडिया के प्रति भी क्या भाव है। आरोप है कि यह अखबार सोशल मीडिया से अफवाहें उधार लेते हैं और उन्हें अपने अखबार में बढ़ा-चढ़ाकर छाप देते हैं, जब खंडन करने की बात आती है, तब भी यह अखबार खंडन नहीं करते। 
 
सोशल मीडिया की फेक न्यूज को लेकर हाल ही में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय ने एक अध्ययन करवाया। इस अध्ययन में भी यह बात उजागर हुई कि सोशल मीडिया पर अफवाहों को नियोजित तरीके से प्रचारित किया जाता रहा है, ताकि सही खबर आम लोगों तक ना पहुंचे, इसमें बड़ी भूमिका विज्ञापनदाताओं की भी होती है। अफवाहों को फैलाने के लिए लोग सोशल मीडिया पर अज्ञात स्त्रोतों को बढ़ा-चढ़ाकर कोट करते हैं। फेसबुक और ट्विटर पर किए गए पोस्ट की विश्वसनीयता को जांचने का कोई पैमाना पत्रकारों के पास नहीं होता, वे जब तक इन पोस्ट की जांच करते हैं, तब तक तो पोस्ट वायरल हो चुका होता है। 
 
अध्ययन में यह बात भी उजागर हुई कि आमतौर पर प्रायोजक अपनी तरफ से इस तरह के कंटेंट को प्रचारित करते हैं, जिससे उपभोक्ता अनुचित उत्पाद या सेवा के प्रति आकर्षित हो। जैसे बैंक के अधिकारी इस तरह के कंटेंट को लगातार प्रचारित करते रहते हैं, जिसमें वित्तीय नियोजन की बातें जोरशोर से की जाती हैं। मिडिल क्लास के विद्यार्थियों से एक सर्वे करके यह अध्ययन करने की कोशिश की गई कि वे समाचार और विज्ञापन के बीच फर्क कर पाते हैं कि नहीं, तब पता चला कि बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी हैं, जो सोशल मीडिया पर तो हैं, लेकिन उन्हें इस बात की समझ नहीं है कि जो कंटेंट वह पढ़ रहे हैं, वह समाचार है या विज्ञापन। दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर अफवाहों को फैलाने के लिए अमेरिका जैसे देश में भी न्यूज चैनलों के फर्जी अकाउंट खोले और संचालित किए जा रहे हैं। 30 प्रतिशत विद्यार्थियों ने समाचार चैनल के नकली अकाउंट को न केवल असली बताया, बल्कि उसके पक्ष में बहस करने को भी तैयार हो गए। 
 
कॉलेज के विद्यार्थी भी पर आए नतीजों को पत्थर की लकीर मानकर चल रहे थे, जब उन्हें बताया गया कि गूगल पर आने वाली हर सामग्री सत्य हो, यह जरूरी नहीं। ऐसी अनेक वेबसाइट्स हैं, जो गूगल सर्च में सामने आती हैं, लेकिन उनका कंटेंट सत्य के विपरीत होता है।
 
शोधकर्ताओं ने अंत में निष्कर्ष निकाला कि सोशल मीडिया पर फर्जी समाचारों को फैलने से रोकने के लिए विद्यार्थियों को इस तरह का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए, जिससे वह असली और झूठी वेबसाइट में फर्क कर सकें, वे समझ सकें कि जिस कंटेंट को प्रचारित किया जा रहा है, वह विश्वसनीय है या नहीं और उसका जनक कोई पत्रकार है या विज्ञापन एजेंसी? इस अध्ययन से अनेक वेबसाइट्स की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है? 

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