बिहार में सत्ता बदल को कैसे देखें


द्वारा विधानसभा में बहुमत प्राप्त करने के साथ बिहार की राजनीति पूरी 360 डिग्री तक मुड़ चुकी है। हालांकि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री थे और हैं भी। किंतु इस थे और हैं में बहुत बड़ा अंतर आ गया है। पहले वे महागठबंधन के भाग थे और अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के। यह कहा जा सकता है कि इसके पूर्व भी वे 16 जून 2013 तक राजग के भाग थे यानी भाजपा के साथ थे। चार वर्ष बाद फिर से वे वहीं लौट गए हैं। तो नीतीश कुमार की बिहार की सत्ता की राजनीति फिर से वहीं आ गई हैं जहां से आरंभ हुई थी। वास्तव में नीतीश कुमार के आलोचक यह न भूलें कि उन्होंने करीब 17 वर्षों तक बिहार में भाजपा के साथ मिलकर राजनीति की और वह राजनीति लालू प्रसाद यादव के खिलाफ थी। भाजपा में नरेन्द्र मोदी का विरोध करते हुए वे अलग हुए तथा 2014 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारे। लालू प्रसाद यादव की पार्टी भी हारी और और कांग्रेस भी। इसमें अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की विवशता के तहत नीतीश कुमार ने लालू यादव का हाथ थामा और लालू को भी लगा कि इसके अलावा भाजपा से मुकाबला करने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इस तरह नीतीश का लालू यादव के साथ आना एक ऐसी राजनीतिक विवशता की पैदाइश थी, जो नीतीश कुमार ने स्वयं पैदा की थी।
कहा जा सकता है कि नीतीश ने जो राजनीतिक विवशता स्वयं पैदा की थी, उसे जब खत्म कर दिया तो बिहार में चार वर्ष पूर्व की स्थिति कायम हो गई। लेकिन प्रश्न है कि आखिर उस राजनीतिक विवशता को खत्म करने यानी भाजपा के साथ आने का कारण क्या था? नीतीश कुमार जब राजद एवं कांग्रेस के साथ गठबंधन का नेतृत्व कर रहे थे, उनके पास 243 सदस्यों की विधानसभा में 178 विधायकों का साथ था जबकि अब उनके पास केवल 131 विधायकों का समर्थन है। तो संख्याबल के हिसाब से वो कमजोर हुए हैं। यह बात अलग है कि विधानसभा में बहुमत से यह आंकड़ा ज्यादा है। जो लोग यह आरोप लगाते हैं कि नीतीश ने सिर्फ सत्ता के लिए पाला बदला है वे इस बात का ध्यान नहीं रखते कि सत्ता की बागडोर तो उनके हाथों में थी ही। राजद या कांग्रेस उनसे नेतृत्व छीनने नहीं जा रही थी। किसी ने उनकी कार्यशैली पर कोई प्रश्न नहीं उठाया था। वास्तव में नीतीश कुमार पर यह तोहमत तो लगाया जा सकता है कि उन्होंने जिस भाजपा एवं नरेन्द्र मोदी की तीखी आलोचना की थी, भाजपा के साथ कभी नहीं आने का ऐलान किया था। अचानक अपने सारे वक्तव्यों को दरकिनार कर वे भाजपा के साथ आ गए हैं। साफ है कि इससे संबंधित सवाल लंबे समय तक उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे। ऐसे सवालों का संतोषजनक जवाब देने में उन्हें हमेशा कठिनाई होगी। यह भी कहा जा सकता है कि संभवतः भाजपा के साथ जाने से उनकी सरकार कायम रहने की संभावना न होती तो वे ऐसा करने से पहले सौ बार विचार करते किंतु केवल सत्ता की लालच में पाला बदलने के आरोपों को स्वीकार करना कठिन है। तो फिर?
एक कारण बिल्कुल सामने है। जब तक प्रवर्तन निदेशालय एवं आयकर विभाग का हाथ लालू परिवार के दूसरे सदस्यों तक पहुंचा था, तब तक नीतीश के लिए ज्यादा समस्या नहीं थी। किंतु जब सीबीआई का हाथ तेजस्वी यादव तक पहुंच गया, तो नीतीश के सामने धर्म संकट पैदा हो गया। एक ऐसा व्यक्ति, जिसके खिलाफ गलत तरीके से संपत्ति बनाने के मामले में सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की, जिसके खिलाफ बड़े छापे की कार्रवाई हुई उसे अपने मंत्रिमंडल में वे कैसे बनाए रखते, जबकि इसके पूर्व सरकार में आरोप लगने पर उन्होंने अपने मंत्रियों का त्यागपत्र ले लिया था। जाहिर है, उन्होंने भले खुलकर तेजस्वी से इस्तीफा नहीं मांगा लेकिन यदि उनके तथा लालू प्रसाद यादव के वक्तव्य को देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि दोनों के बीच इस विषय पर लगातार बातचीत हो रही थी। उनके बीच क्या बातचीत हुई यह पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुआ है। हां, जदयू के प्रवक्ताओं ने यह बयान अवश्य दिया कि तेजस्वी यादव पर जो आरोप लगे हैं उसके बारे में वे बिन्दूवार जनता के सामने अपना स्पष्टीकरण दें। इसके समानांतर लालू परिवार और राजद के प्रवक्ता केवल यह कहते रहे कि सारी कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से की जा रही है। यानी भाजपा सरकार सीबीआई का उनके खिलाफ दुरुपयोग कर रही है। सीबीआई के प्रवक्ता ने साफ कहा था कि जब उनके पास मामला आया तो पहले उसकी प्राथमिक छानबीन की गई। उनमें प्रथमदृष्ट्या गड़बड़ी दिखने के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई।

नीतीश कुमार ने स्वयं को ईमानदारी एवं नैतिकता के जितने उंचे पायदान पर अपने को खड़ा किया है, उसमें उनके लिए ऐसे व्यक्ति को अपना उपमुख्यमंत्री बनाए रखना आसान नहीं था। जैसा नीतीश कुमार ने कहा कि उन्होंने राहुल गांधी तथा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष से भी बातचीत की, पर कोई रास्ता नहीं निकला। राजद ने अपने विधायकों की बैठक के बाद बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि तेजस्वी यादव विधानमंडल के नेता बने रहेंगे। यह नीतीश के स्वयं द्वारा बनाए गए मापदंडों के विपरीत स्थिति थी। ठीक है कि नीतीश कुमार ने तेजस्वी से इस्तीफा नहीं मांगा था, पर संकेत साफ था। जिन संपत्तियों को लेकर तेजस्वी यादव को घेरे में लाया गया था उसके बारे में बि‍न्दूवार सफाई देना उनके लिए कठिन था। अगर यह इतना ही आसान होता, तो सीबीआई के छापे के बाद लालू यादव ने जो पत्रकार वार्ता रांची में की उसी में वे सब कुछ साफ कर चुके होते। नीतीश कुमार के सामने स्पष्ट हो गया था कि लालू परिवार किसी सूरत में उनकी बात मानने वाला नहीं है। उनके सामने एक रास्ता तेजस्वी यादव को बर्खास्त करने का था। इससे एक दूसरा राजनीतिक संकट पैदा हो जाता। इसलिए उन्होंने अपना पद त्याग कर दिया।

नीतीश कुमार ने इस्तीफा देने के बाद तथा विधानसभा में विश्वासमत हासिल करते समय जो कुछ कहा उससे यह भी साफ है कि गठबंधन के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। उन्होंने कहा कि उनको निर्णय करने तक से रोका गया, उन्हें काम करने में बाधा डाली गई। सच यही है कि बिहार में सत्ता के दो केन्द्र हो गए थे। किसी पद पर न रहते हुए भी लालू यादव सत्ता के दूसरे केन्द्र थे। वो सीधे सरकारी अधिकारियों को फोन करते थे या अपने आवास पर बुलाकर आदेश देते थे। कुख्यात बाहुबली शहाबुद्दीन के साथ फोनवार्ता का जो स्टिंग सामने आया उसे ही याद करिए। शहाबुद्दीन सीवान के पुलिस अधीक्षक के बारे में शिकायत कर रहा है और लालू यादव अपने सहयोगी को कह रहे हैं कि एसपी को फोन लगाओ तो। यह एक घटना केवल उदाहरण मात्र है। नीतीश कुमार ने निश्चय ही यह तुलना की होगी कि भाजपा के साथ जब वे सरकार चला रहे थे तो वे अकेले नेता थे, सत्ता का एक केन्द्र था और उनके निर्णय के रास्ते कोई समस्या कभी नहीं आई। ऐसे में उन्होंने दूसरे विकल्प को चुनने का रास्ता अपनाया और भाजपा से संपर्क किया।

यह माना जा सकता है कि अगर भाजपा से उनको समर्थन की हरि झंडी नहीं मिलती तो शायद वो अभी कुछ दिनों और मामले को खींचते। किंतु यह भाजपा का बदला हुआ नेतृत्व है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी तत्काल फैसले करती है। संपर्क और संवाद पहले से कायम था। केवल साथ आने की घोषणा बाकी थी। जैसी परिस्थितियां बन रहीं थीं उसमें यदि त्वरित फैसला नहीं किया जाता, तो फिर विधायकों के तोड़फोड़ की संभावना बन जाती। इसलिए भाजपा ने पहले तो तीन सदस्यीय समिति बनाई कि विधायकों से विचार-विमर्श कर फैसला करेगा। फिर उसने देखा कि इसमें समय लगेगा और स्थिति पलट सकती है। इसलिए आनन-फानन में सरकार में साथ आने का ऐलान कर दिया गया। इसके बाद राज्यपाल के सामने भी कठिनाई नहीं थी, क्योंकि दोनों को मिलाकर बहुमत का आंकड़ा पार कर जाता था। आज आप नीतीश कुमार के लिए जो विशेषण दे दीजिए, यह प्रश्न तो उठेगा कि भाजपा को उनके साथ जाना चाहिए था या नहीं। किंतु गठबंधन तोड़ने के लिए उनको दोषी ठहराना एकपक्षीय निष्कर्ष होगा। आखिर गठबंधन बचाने की जिम्मेवारी राजद एवं कांग्रेस दोनों की थी। यदि तेजस्वी यादव को मंत्रिमंडल से हटा ही दिया जाता तो क्या पहाड़ टूट पड़ता। उससे नीतीश कुमार के लिए तत्काल बाहर निकलना कठिन हो जाता। ऐसा नहीं किया गया। इसके विपरीत लालू यादव का बयान है कि जद यू के प्रवक्त या नेता कोई ऑथोरिटी हैं कि हम उनके सामने स्पष्टीकरण देते। हमें जो स्पष्टीकरण देना है वह सीबीआई को देंगे। तो इसमें आप केवल नीतीश को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?

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