झिलाऊ,पकाऊ और ऊबाऊ होने की कला !


प्रीति सोनी  झिलाउ, और उबाऊ होने की भी एक सीमा है... मुझे लगता है कि यह भी एक कला है... इसे मेंटेन करना कितना मुश्किल होता होगा किसी के लिए, कि अपने झिलाऊ होने की गुणवत्ता को उतना ही बरकरार रखा जाए कि लोग दूरी बनाए बिना न रह सके। झिलाउ होने की गुणवत्ता को और बेहतर किया जाए तो, नतीजे के तौर पर लोग आपके किसी स्थान पर पहुंचने से पहले ही, दूर से आपको देखकर अगली गली पकड़ लेंगे या आपकी बातों को अनसुना करते निकल जाएंगे। 
 
झिलाउपन के इस स्तर तक पहुंचने के लिए एक-आध पुरस्कार तो होना ही चाहिए, क्योंकि इस स्तर तक पहुंचना भी धैर्य और बेशर्मी अर्थात स्थानीय भाषा में की ही एक निशानी है। और यह भी कि झिलाऊ व्यक्ति कई बार यह जानते हुए भी, कि लोग उनसे पीछा छुड़ाकर ही खुशी महसूस करते हैं, जान बूझकर अपने इस गुण को बरकरार रखता है।
 
झिलाउपन दरअसल नफरत और प्रेम के बीच झूलता फॉर्मेलिटी अर्थात संकोच भरा भाव पैदा करता है, जिसे अनदेखा भी नहीं किया जा सकता और सहा भी नहीं जा सकता। कभी-कभी तो इससे बचने के लिए पतली गली का सहारा लिया जा सकता है, परंतु किसी विशेष परिस्थिति में यह भाव ओवरफ्लो होकर किसी की का सबब बन जाए तो सीन कुछ प्यार का पंचनामा फिल्म के उस हीरो की तरह होता है, जिसका अपनी प्रेमिका के लिए मिनटों लंबा भड़ास भरा डायलॉग कई दिनों तक दर्शकों के लिए मजेदार चुटकुला की तरह आनंददायक साबित हुआ था। वक्त की नजाकत के हिसाब से तो प्रेमिका पीड़ित प्रेमियों का वही असली हीरो बनाम महीसा बन गया था। तब तो नायक अपनी नायिका अर्थात गर्लफ्रेंड से तंग आ चुका था, लेकिन जिंदगी में इस तरह के कई आयाम हैं, जिनके बारे में आपके मन में कभी न कभी ऐसा विचार अवश्य आया होगा, कि एक ही सांस में इतना लंबा भाषण देकर मन की भड़ास निकालकर शांति पाई जाए। फिर चाहे सामने वाला सदमे में आए, घंटों तक आपकी शब्द सीमा को बिनता रहे या फिर खलनायक ही क्यों न बन जाए! 
 
कभी-कभी सिर्फ जरूरी ही नहीं होता बल्कि झिलाउपन से बचने के लिए रामबाण साबित होता है मन की भड़ास का निष्कासन। हालांकि कभी यह आपके लिए अमृत साबित होगा, तो कभी मुसीबत...जिसे आप कुल्हाड़ी पर पैर रखना कहते हैं, लेकिन मन चंगा तो कठौती में गंगा! 
 
हालांकि झेलने, झि‍लाने और पकाउपन के इस मामले में महान सिर्फ वही नहीं है जो झिलाऊ है। बल्कि झेलने वाला व्यक्ति भी सम्मान का पात्र है, जो कम से कम शुरुआती समय में तो अपने धैर्य का परिचय देते हुए आगे बढ़ता ही है। यही शुरुआती वक्त तकलीफदेह होता है, बाद में तो झिलाऊ को भी उतनी तवज्जो नहीं मिलती, और वह पकाने के लिए नए मुर्गे भी तलाशना शुरु कर देता है। ऐसे में झेलने वाला खास इसलिए भी है, क्योंकि अगर उसमें धैर्य नहीं होता, तो शायद वह शुरुआती समय में ही झिलाऊ व्यक्ति को चलता कर देता, पर सम्मान और संकोचवश ही सही, वह अनजाने में अदम्य साहस और धैर्य का परिचय देता है। इसलिए वह विशेष रूप से सम्माननीय है, क्या बोलते हो! 

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