मनोरम यात्रा संस्मरण : झीलों का शहर नैनीताल

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डॉ. मधु संधु 
जिन्हें गर्मी की छुट्टियां कहा जाता है, इस साल वह बरसात की छुट्टियां बन गई थी। फिर भी बरसाती उमस और पसीने से थोड़ा सा छुटकारा पाने के लिए, बच्चों के हॉलिडे जोश को कायम रखने के लिए, अपने लिए वर्ष भर की स्मृतियां संजोने के लिए ठंडे पहाड़ों की यात्रा पर तो जाना ही था।
> यूं तो अपने पंजाब में कोई पर्वतीय ही नहीं है, फिर भी पड़ोस के राज्य हिमाचल के धर्मशाला, मैकलोडगंज, कुल्लू, मनाली, शिमला, डलहौजी और उनके आसपास के सेटेलाइट स्थल धर्मकोट वगैरह काफी नजदीक पड़ते हैं। एक बार गाड़ी में बैठो और ठीक होटल के सामने आकर उतरो। सामान को बार-बार उतारने, चढ़ाने, संभालने की कोई दिक्कत नहीं।
  
धर्मशाला, मैकलोडगंज, कुल्लू, मनाली, शिमला, डलहौजी से उकताए बच्चे, इस बार का मन बना चुके थे और उधर टीवी, इंस्टा न्यूज, समाचार पत्र आदि वर्षा, बाढ़, भूमि स्खलन, रास्तों का बंद होना आदि की अपनी खबरों से सब के इरादे ध्वस्त कर रहे थे। 2012 की उत्तराखंड की त्रासदी की ओर भी बार-बार मन जा रहा था। सुझाव तो यह भी था कि कहीं जाना ही है तो डलहौजी तक हो आते हैं। चार-साढ़े चार घंटे का रास्ता, दो दिन रुको और पहाड़ की सैर की मोहर भी लग जाएगी। शिमला तक का दिलासा भी दिया जा रहा था। इधर तीन-चार दिनों से समाचार सबका मूड बदलने में लगे थे। निर्णय समुद्र तट से 1938 मीटर की  ऊंचाई पर स्थित उत्तराखंड के झीलों के नगर का हुआ।
 
समस्या यह थी कि नैनीताल के लिए न सीधी रेल सेवाएं हैं और न हवाई सेवाएं। नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम 34 किलोमीटर दूर है और नजदीकी एयरपोर्ट पंतनगर 55 किलोमीटर। सब तरह की सुविधा-असुविधा का ध्यान रखते हुए यू.पी. के मुरादाबाद के लिए और मुरादाबाद से वापसी की रेल गाड़ी की टिकटें बुक करवा दी गई। दोनों तरफ रात का सफर था। भले ही आगे की यात्रा (उत्तरप्रदेश से उत्तराखंड)132 किलो मीटर यानी साढ़े चार घंटे की थी। 12 जुलाई को शाम के पौने सात बजे अमृतसर से हावड़ा पकड़नी थी। कैब से परिवार रेलवे स्टेशन पहुंच गया। गाड़ी आध-पौन घंटा देरी से थी। लेकिन जाने के उत्साह में समय का पता ही नहीं चला। भारत में रहते हैं, इतना तो चलता ही है। 
 
ए.सी. के कारण एकदम ठंडा कंपार्ट्मेंट था। बैठते ही चैन पड़ गया। थोड़ी रात होते ही रेलवे कर्मचारी खाने के ऑर्डर का पूछने लगे। रात का खाना हम साथ ही लेकर आए थे, फिर भी बिरयानी वगैरह मंगवा ली। इसी बीच रेलवे कर्मचारी लिफाफों में बंद साफ-धुली चादरें और खुले सिरहाने-कंबल लाने लगे। टू-टायर स्लीपर थे। बच्चे मजे के मूड में थे। गाड़ी में सोना उन्हें एडवेंचर लग रहा था। 
 
मुझे पढ़े-देखे समाचारों के संदर्भ याद आ रहे थे। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट, वाजपेयी सरकार में 1999 से 2004 तक इंडस्ट्री, ऊर्जा और पर्यावरण मंत्री रहे सुरेश प्रभु वर्तमान मोदी सरकार के रेल मंत्री हैं। सरकार ने रेलवे का भारी-भरकम बजट पास किया है। सुरेश प्रभु ने कहा है कि रेलवे को जनसामान्य के जीवन का महत्वपूर्ण एवं उपयोगी अंग बनाने पर काम करेंगे। शब्दों से अधिक उनका काम बोलेगा। खानपान को लेकर बदलाव होगा। सीसीटीवी कैमरे से लैस गाड़ी चलेगी, वगैरह-वगैरह। पर यहां कुछ खास महसूस नहीं हुआ। वही आधे-अधूरे, टूटे-फूटे, गंदे-बदबूदार वाशरूम, वही कचरे से भरे प्लेटफार्म, वही कचरे को रेलवे प्लेटफार्म से रेलवे पटरी पर फेंकते सफाई कर्मचारी, वहीं वर्षा के जल से कीचड़ बने रेलवे ट्रैक और उन पर तैरता कचरा। 
 
सफर रात का था। 13 जुलाई प्रात: पांच के आसपास हम गाड़ी से उतरे। टैक्सी तैयार थी और हम झीलों के शहर नैनीताल के लिए रवाना हो गए। कहते हैं कि कभी यहां 60 ताल थे। नैनी झील का निचला भाग तल्लीताल और ऊपरी भाग मल्लीताल कहलाता है। दस बजे तक हम तल्लीताल को मल्लीताल से जोड़ने वाली सड़क माल रोड पर स्थित होटल अल्का पहुंच चुके थे। पूरा माल प्राइवेट होटलों से भरा पड़ा है। हमारे अपार्टमेंट दूसरे तल्ले पर थे और बालकनी से पल-पल रंग बदलती नैनी झील के जलवे दिख रहे थे। उसके पीछे के घने जंगल दूर से और भी घने लग रहे थे। यात्रा की थकान को दूर करने के लिए शाम तक हम सबने विश्राम किया।
 
झील की रंगबिरंगी नौकाएं अल्का होटल की बालकनी से ही अपना जादू बिखेर रही थी। बच्चों के लिए तो अपने पर नियंत्रण करना कठिन हो रहा था। हमारा पहला कार्यक्रम नौकायन का ही बना। रंग-बिरंगे याट थे, पैंडल वाली नौकाएं थी, मांझी भी पर्यटकों को नौका में झील के चक्कर लगवा रहे थे। हमें तो मांझी वाली नौकाएं ही ठीक लगी। पानी मे मछलियां तैर रही थी। चक्कर लगाते-लगाते मांझी से बातचीत भी चलती रही, कि ताल की गहराई 15 से 156 मीटर तक मापी गई है, हालांकि सही-सही जानकारी किसी को भी नहीं है। लंबाई 1358 मीटर और चौड़ाई 458 मीटर है। ताल के चारों ओर सड़क है, जहां लोग सैर भी करते हैं। कभी- कभार जंगल से कोई भालू झील तक आ भी जाए तो स्वयं लौट जाता है, जैसे कि दो-एक दिन पहले समाचार पत्र में खबर आई थी।
 
नौकायन के अलावा झील का प्रमुख आकर्षण वहां का मंत्र-मुग्ध कर देने वाला सफेद बतखों का झुंड था, जिसे हम नित्य सुबह-शाम होटल अल्का की बालकोनी से मस्त विहार करते देखा करते थे। रात के दृश्य और भी नयनाभिराम थे। ताल में आसपास की पड़ रही रोशनियां हजारों बल्बों के रूप में जगमगाते हुए, सौंदर्य को बहुगुणित कर रही थी।  
 
14 जुलाई अर्थात अगले दिन चिड़ियाघर देखने के लिए हमें निकलना था। अल्का होटल से लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही चिड़ियाघर के लिए गाड़ियां चलती थी। दूर तो नहीं था, पर एकदम सीधी चढ़ाई थी। प्रवेश द्वार पर हम उतरे। इस चिड़ियाघर का नाम उत्तरप्रदेश के प्रथम मुख्य मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी गोविंद वल्लभ पंत के नाम पर रखा गया है। यहां मोर थे, कई तरह की चिड़िया और दूसरे पक्षी थे। बंदर और लंगूर थे। लेकिन बच्चों का मन जहां रमा, वहां दो शेर थे, जो कभी मचान पर चढ़ जाते थे और कभी अपने क्षेत्र में घूमने लगते थे। बाहर दो बोर्ड लगे थे, जिन पर लिखा था कि इस शेर का नाम सुंदर है। इसकी मां का नाम श्वेता था। उसने इसी चिड़ियाघर में सुंदर को अप्रैल 1998 को जन्म दिया। आम तौर पर शेर की आयु 15 से 20 वर्ष तक होती है। देवज्ञ-सर्वज्ञ बार-बार सुंदर को आवाज देते थे और सुंदर भी अपना नाम सुन गर्दन उठाकर देखता था। कुछ रास्ते सीढ़ियों और रेलिंग दोनों से थे। रंगबिरंगी मछलियों से भरा एक छोटा-सा तालाब था। पीछे कल-कल करता झरना था। नैनीताल में छाते तो लगातार हमारे पास ही रहे। पता ही नहीं चलता था कि कब मूसलाधार वर्षा आ जाए और छमाछम सब तर-बतर हो जाएं।
   
शाम को हम झील के ऊपरी हिस्से अर्थात मल्लीताल के लिए निकले। यहां बड़े-बड़े खुले मैदान थे। लोग खेल रहे थे। स्टेडियम की तरह बैठने की जगह थी। नयनदेवी का नयनाभिराम मंदिर यहीं पर है। बाहर तरह-तरह की चीजें बिक रही थी। लोग अपने लिए और अपनों के लिए उपहार खरीद रहे थे। शहर नैनीताल, नैना देवी के मंदि‍र और नैनी झील का अपना ऐतिहासिक, पौराणिक, आध्यात्मिक महत्व है। कहते हैं कि नैनीताल की खोज 1841 में चीनी के व्यापारी एक अंग्रेज ने की थी। नैनीताल 64 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के शव को लेकर पूरे ब्रह्मांड में भटक रहे थे, तो देवी का एक नयन यहां गिर गया, इसी से इस जगह का नाम नैनीताल पड़ गया। नैनी झील में लगाई डुबकी मानसरोवर में लगाई डुबकी जितनी ही पवित्र मानी जाती है। 
 
तीसरे दिन, 15 जुलाई को हम फिर रोप-वे से म्यूजियम पार्क के लिए माल रोड से बड़े बाजार की तरफ निकले। ट्राली स्टेशन पर जाकर टिकट ली और बारी आने पर 2270 मीटर ऊंची चोटी पर जा पहुंचे। ट्राली में नयन आकार की स्पष्ट झील दिखने लगी। नीचे सड़कें भी थी, हरियाली भी, घर भी और घरों में घूमते, काम-काज के लिए अंदर-बाहर जाते लोग भी। म्यूजियम पार्क में बच्चों के लिए झूले थे, कारें थी, घुड़सवारी थी, खाने-पीने की चीजें थी। वापसी का समय टिकट पर ही लिखा था और उसी के हिसाब से ट्राली से हम लौट आए। 
 
शाम को फिर नौकायन का मूड बना। अल्का से सड़क क्रॉस करते ही सामने मांझी नौकाएं लिए बैठे थे। इस बार पैडल वाली नौकाओं पर बैठे, लेकिन जल्दी ही मौसम बिगड़ गया। मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। धने कोहरे जैसा कुछ था कि नजदीकी स्थल भी स्पष्ट नहीं दिख रहे थे। नौकाओं से उतर लौटना पड़ा। यह पंद्रह जुलाई की शाम थी। सोलह को सावन का प्रथम दिन था, पर उसने पूर्व संध्या को ही अपने रंग बिखेरने शुरू कर दिए थे। यह वर्षा पूरी रात ही नहीं, अगले दिन भी वैसी थी।
    
नैनीताल बहुत साफ सुथरा शहर है। कचरे का तो नामों-निशान भी नहीं। झील और सड़कें, मंदि‍र और मैदान, सब स्वच्छ, सुंदर और आकर्षक। स्थान-स्थान पर लिखा था कि कचरा फेंकने पर 500 रुपये जुर्माना होगा। पर्यटक भी इसलिए सचेत रहकर डस्टबिन का प्रयोग करते हैं। माल का रास्ता शाम छह से नौ बजे तक वाहनों के लिए बंद कर दिया जाता है और यात्री आराम से पैदल घूम सकते हैं।
 
16 जुलाई की दोपहर हमें वापसी के लिए निकलना था। पर पिछले दिन से शुरू हुई बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। कार्यक्रम तो वापसी पर कुछ दर्शनीय स्थल देखने का था, लेकिन मौसम ने इसकी इजाजत नहीं दी। मौसम थोड़ा साफ होने पर जिम कॉर्बेट म्यूजि‍यम पर ही रुकना हुआ। यह कालढूंगी से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित 22 बीघे में फैला है। यहां जिम कॉर्बेट की प्रतिमा, अंग्रेजी और हिन्दी में फ्रेम किया हुआ परिचय और उनकी धरोहर के रूप में कुछ चीजें थी। पर एक बात खटक रही थी कि इस धरोहर को पूरी तरह संरक्षित नहीं किया गया। वापसी की गाड़ी मुरादाबाद से रात ग्यारह बजे की थी। समय बिताने और डिनर वगैरह करने के लिए वेव मॉल में चले गए और फिर समय पर स्टेशन पहुंचकर अमृतसर के लिए गाड़ी पकड़ ली।

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