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हिंदू धर्मग्रंथों में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। वर्तमान में मानव भोग-विलासिता और संभोग को ही जीवन माने बैठा है। इसी के चलते उसका पारिवारिक, सामाजिक जीवन तो खतम होता ही है साथ ही वह रोगग्रस्त होकर समय पूर्व ही मृत्यु का शिकार बन जाता है। वह जीवन का भरपूर लुफ्त नहीं उठा पाता।

दरअसल भोग भी उतना ही जरूरी है जितना की संभोग, लेकिन इसके साथ ही यदि 'योग' जोड़ दिया जाए तो धर्म और मोक्ष का लक्ष्य भी पूर्ण हो जाता है। रहा सवाल अर्थ का तो उसीसे सब कुछ तय होता है। तो भोग, संभोग और योग को साधकर तीनों में संतुलन होना जरूरी है।

भोग संयम : खाओ-पीओ उतना की रोग ना हो, अपच ना हो या खाने के कारण‍ किसी भी प्रकार की कोई शिकायत ना हो। खाओ वह जो शरीर और मन के लिए लाभदायक और पोषक हो। जरूरी विटामिन और प्रोटिन का उपयोग जरूरी भी है तो फिर यौगिक आहार को जानना भी जरूरी है। किसी भी प्रकार के भोग के लिए शरीर का बल जरूरी है। बल से ही बुद्धि कायम रहती है ऐसा योग कहता है। भोग सुख से अन्य तरह के सुखों की प्राप्ति होती है।

संभोग संयम : संभोग करने के अपने नियम और समय है। कामसूत्र या कामशास्त्र में संभोग का समय और नियम बताए गए हैं। संभोग की अति भी नुकसानदायक है। संभोग सुख से अन्य तरह के सुखों की प्राप्ति भी होती है।

योग संयम : संसार के सारे सुख तभी तक कायम हैं जब तक की शरीर, प्राण, बुद्धि और मन स्वस्थ्‍य और जिंदा हैं। सभी को स्वस्थ्य बनाएँ रखकर दीर्घ जीवन जीने के लिए योग करना जरूरी है। यदि शरीर में रोग है तो दवा-दारू से तो ठीक हो सकता है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं। रोग न हो और शरीर भी फिट बना रहे तो इसके लिए योग ही बेहतर विकल्प है। फिट व्यक्ति ही संसार के सारे सुखों को भोगने की ताकत रखता है।

तीनों में संयम जुड़ा होने के कारण यह तो समझ में आता ही है कि सभी में संयम होना कितना जरूरी है। तो योग कहता है कि संकल्प से ही संयम साधा जाता है।

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