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दायित्व तो मिला, सुरक्षा नहीं
महिला पंचायत प्रतिनिधि
हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जब महिला पंचायत प्रतिनिधियों को पंच-सरपंच की भूमिका निभाने की कीमत चुकानी पड़ी। पंचायत राज के पहले कार्यकाल में मंदसौर जिले की ग्राम पंचायत अम्बा की महिला सरपंच की उसके पति ने इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि वह पंचायत मीटिंग में जाकर गाँव की विकास में अपनी भागीदारी निभा रही थी।

इसी तरह टीकमगढ़ जिले की ग्राम पंचायत पिपराबिलारी की दलित सरपंच गुंदियाबाई को गाँव के दंबगों ने स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रध्वज फहराने से रोक दिया था।

अविश्वास प्रस्ताव को भी महिला सरपंचों के उत्पीड़न के रूप में उपयोग किया जाता है। सक्रिय महिला सरपंचों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने एवं उनकी झूठी शिकायत के कई उदाहरण हमारे सामने हैं

मध्यप्रदेश के ही देवास जिले के बागली जनपद की ग्राम पंचायत मनासा में उपसरपंच व पंचायत सचिव द्वारा विकास योजनाओं में किए जा रहे घोटाले का विरोध करने पर दलित महिला सरपंच के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसी जिले की ग्राम पंचायत चंदवाना की सरपंच अमरावतीबाई द्वारा विकास कार्यों में अगुवाई करने पर गाँव के दबंग लोगों द्वारा अनुविभागीय अधिकारी से झूठी शिकायत की गई।

जाहिर है, 73वें संविधान संशोधन के अंतर्गत पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी को न सिर्फ संवैधानिक मान्यता दी गई, बल्कि उनकी भागीदारी अनिवार्य मानी गई है। किन्तु महिलाओं को लेकर पुरुष प्रधान समाज में कई तरह की पुरातन मान्यताएँ हैं, जैसे पर्दा प्रथा, चहारदीवारी में जिंदगी बिताना, चूल्हे-चौके के काम में जुटे रहना और पुरुषों के आगे नहीं बोलना आदि

इसके चलते महिलाओं को अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यदि हम पंचायत राज अधिनियम पर नजर डालें तो उसमें महिलाओंके लिए आरक्षण, अविश्वास प्रस्ताव, धारा 40 के अंतर्गत भ्रष्टाचार को रोकने जैसे प्रावधान तो हैं, लेकिन महिला पंचायत प्रतिनिधियों को अपना दायित्व निभाने में बाधा उत्पन्न करने वालों के लिए किसी भी तरह की कार्रवाई के प्रावधान नहीं हैं

यानी महिलाओं को आरक्षण देने वाला पंचायत राज अधिनियम महिला पंचायत प्रतिनिधियों को किसी भी तरह की विशेष सुरक्षा प्रदान नहीं करता। उन्हें अपने ऊपर हिंसा होने पर फौजदारी कानून के तहत फरियाद करनी पड़ती है। यही कारण है कि पंचायत राज की स्थापना के डेढ़ दशक बाद भी महिला पंचायत प्रतिनिधियों पर हिंसा की घटनाएँ सामने आती रहती हैं।

पंचायत राज अधिनियम में ऐसे संशोधन की जरूरत है, जो महिलाओं को विशेष सुरक्षा प्रदान करें और उनके खिलाफ हिंसा होने पर विशेष धाराओं के तहत अपराधियों पर मुकदमा कायम किया जाए। तभी महिला पंचायत प्रतिनिधि गाँव के विकास में अपनी भूमिका बेहतर तरीके से निभा सकेंगी और बैतूल जिले जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकेगी। (सीसीएन)
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