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समाज को बदल डालो!
जो लोग इसी आशा में परिवार नियोजित नहीं करते कि पुत्र ही उनकी आत्मा का उद्धारक है, मोक्षदायक है, तो उनसे यह अपील है कि जब वे आत्मा को ही मानते हैं तो यह भी लगे हाथों मान लें कि लड़के और लड़की का अंतर दैहिक है। आत्मा का कोई आकृति विज्ञान नहीं है। सबकी आत्मा बराबर है। जहाँ तक शास्त्रोक्त होने की बात है, वहाँ तो पिछली सदियों में तो यह भी कहा गया था कि दलित और स्त्री वेद सुनें तो उनके कानों में पिघला सीसा डाल दिया जाए! तो यह तो बदलना ही था, क्योंकि यह अतार्किक, अनुचित और अन्यायपूर्ण था। वैसे ही वह चीजें भी बदलना चाहिए जो आज अतार्किक हैं।

प्रथम प्रतिश्रुति में आशापूर्णा देवी की नायिका सत्यवती 'मगज के अंधे' पुरातनपंथियों की अच्छी चुटकी लेती है। कविता रचने वाली सत्यवती से जब यह कहा जाता है कि हमारे समाज में लड़कियाँ पद्य नहीं रचतीं तो वह फट से पूछ लेती है, 'तो फिर आपकी विद्या की देवी सरस्वती क्यों हैं? क्या वे लड़की नहीं।' वैसे ही आज भी यह पूछा जा सकता है-हाथ में नरमुंड लिए देवी माँ क्रोधित हो मानव शव पर नृत्य कर रही हैं तो क्या वे स्त्री नहीं, जब रौद्र रूप में न हों तब क्या वे कोमलांगी नहीं? और यह क्या ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों उनके सामने हाथ जोड़ स्तुति में खड़े हैं। उन्होंने तो 'स्त्री-शक्ति' का विरोध नहीं किया?

सच तो यह है कि आज के समाज में भी कई पुरुष उदार भी हैं, अतः वे सब 'पुरुष जाति' कहला कर उन पुरुषों का प्रतिनिधित्व नहीं करते जो कट्टरपंथी हैं? और परिवर्तनों के प्रति विरोध के स्वर ऐसी स्त्रियों के भी होते हैं, जिनका दिमाग प्राचीन अँधेरी कंदराओं में अटक कर रह गया है। उन्हें एक्सपोजर नहीं मिला, अतः रोशनी उनके लिए वर्जना है, चेतना नहीं। इसके लिए जरूरी है कि स्त्री चेतना के कुछ सच्चे उदाहरण समाज के सामने आएँ।
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