| | महिलाओं के प्रति दोमुँहा समाज | | | | | | | | | | | |
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| - सूर्यकांत नागर कहने को औरत की दुनिया बदल रही है, लेकिन क्या सचमुच बदली है? आंशिक रूप से बदलाव आया है, पर अभी बहुत कुछ शेष है। आज भी गलत परंपराओं, अंधविश्वासों और दूषित मान्यताओं ने भारतीय समाज को जकड़ रखा है। इसी का परिणाम है कि हमारे यहाँ तलाकशुदा, परित्यक्ता और विधवा स्त्रियों के संबंध में कोई अच्छी धारणा नहीं है। तलाकशुदा और परित्यक्ता को हेय दृष्टि से देखा जाता है। माना जाता है कि खोट कहीं न कहीं उन्हीं में होगी। युवा होने पर तो उन्हें और भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उन्हें समाज में वांछित सम्मान नहीं मिलता, जबकि एक सच्चाई यह भी है कि अक्सर भूल स्त्री की नहीं होती। स्त्री तो अधिकांशतः तलाक बचाने की कोशिश करती है। | | यदि विवाह हुए अधिक समय न हुआ हो और कोई संतान भी न हो तो कोशिश होने लगती है कि विधवा या तो मायके चली जाए अथवा अन्य से विवाह कर ले। मन में सोच यह रहती है कि कुछ समय पूर्व ही परिवार में आई स्त्री, यहीं रह गई तो संपत्ति में हिस्से की हकदार हो जाएगी। |
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कभी बच्चों के कारण, कभी परिवार को टूटने से बचाने के लिए और कभी घर की बात बाहर न जाए, इस खातिर। घर की इज्जत बचाने की जवाबदारी भी स्त्री के ही खाते में है। कैसी विडंबना है कि पुरुष को कभी "परित्यक्त" नहीं कहा जाता, जबकि स्त्री के आगे झट से "परित्यक्ता" लगा दिया जाता है। दूसरा पुरुष भी उसे संदेह की दृष्टि से देखता है और उसे स्वीकारने से पूर्व दस बार सोचता है।पुरुष जब भी विवाह के लिए विज्ञापन छपवाता है, उसे सदैव सुशील, शिक्षित, गृहकार्य में दक्ष, सुंदर, कुँआरी कन्या की अपेक्षा होती है। विधवा या परित्यक्ता को अपनाने के लिए भी वह तब तैयार होता है, जब खुद अधेड़ या विधुर हो अथवा जब काफी प्रयत्नों के बाद भी उसे कोई लड़की नहीं मिल पा रही हो। उसकी यह अपेक्षा भी होती है कि विधवा-परित्यक्ता स्त्री संतानविहीन हो, भले ही पहली पत्नी से खुद उसकी दो-तीन संतानें हों। यह दोहरा मापदंड पुरुष के अहम् को उसकी सत्ता तथा उसके "अपर हैंड" होने की मानसिकता को दर्शाता है। इसी तरह युवा स्त्री के विधवा होने का दोष भी उसी के माथे मढ़ दिया जाता है। सास कहती पाई जाती है- "अभागन तेरे ही भाग्य फूटे थे कि मेरे बेटे की मौत हो गई"। दुःख में डूबी बेचारी बहू (पत्नी) यह भी नहीं कह पाती कि तुम्हारा भी तो बेटा था। क्या यह तुम्हारा दुर्भाग्य नहीं हो सकता? यही नहीं, यदि विवाह हुए अधिक समय न हुआ हो और कोई संतान भी न हो तो कोशिश होने लगती है कि विधवा या तो मायके चली जाए अथवा अन्य से विवाह कर ले। मन में सोच यह रहती है कि कुछ समय पूर्व ही परिवार में आई स्त्री, यहीं रह गई तो संपत्ति में हिस्से की हकदार हो जाएगी। वस्तुतः जिस घड़ी पीड़ित स्त्री को सहानुभूति और विश्वास मिलना चाहिए, उस घड़ी उसके साथ दुर्व्यवहार होता है। शुभ प्रसंगों से उसे दूर, अलग रखा जाता है। एक उदाहरण से यह और स्पष्ट हो जाएगा। चौथी तक पढ़ी, साफ-सुथरी, सुदर्शना, तुलसा (कल्पित नाम) का पति होर्डिंग लिखने वाला पेंटर था और सौ-डेढ़ सौ रुपए रोज आराम से कमा लेता था। तुलसा दो बच्चों की पढ़ाई और घर-खर्च में हाथ बँटाने की दृष्टि से आसपास के बंगलों में भांडे-कपड़े, झाडू-पोंछा का काम करने लगी थी। स्वाभिमानी तुलसा अपनी शर्तों पर काम करती थी। कभी एक कप चाय की माँग भी नहीं करती। बहुत ईमानदार थी। नागा (छुट्टी) बहुत कम करती थी, इसलिए तुलसा का अपना रुआब था, अपना साम्राज्य। एक दिन होर्डिंग (बोर्ड) टाँगते हुए तुलसा के पति का पैर फिसला और वह नीचे आ गिरा। सिर में ऐसी गहरी चोट आई कि दो दिन बाद ही चल बसा। तुलसा पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। तेरह दिनों के बाद काम पर जाना शुरू किया, तो महसूस किया कि मेमसाब लोगों के व्यवहार में बदलाव आने लगा है। यह भाव कि अब तो असुरक्षित है, भाव खाएगी तो जाएगी कहाँ? अतः धीरे-धीरे टोका-टोकी शुरू हुई- "तुलसा आज आने में बहुत देर कर दी", "आजकल छुट्टियाँ कुछ ज्यादा ही करने लगी है", "देख, बर्तन में जूठन रह गई है"। एक बार मजबूर हो बच्चों की फीस के लिए माह समाप्त होने से कुछ दिन पूर्व वेतन माँग लिया था, तो मेहरा मेम साहब (कल्पित नाम) ने बहाना बनाकर बड़ी तरकीब से टाल दिया था। बात यहीं खत्म नहीं हुई। महिलाएँ भले ही असंवेदनशील हो रही हों, पर पुरुषों की सहानुभूति तुलसा के प्रति बढ़ रही थी। पहले कभी उससे बात न करने वाले पुरुष अब यदा-कदा उसके साथ हँसी-मजाक करने लगे थे। पत्नियों से कहते, "बेचारी दुखी है, ज्यादा परेशान मत करो"। तुलसा के प्रति मि. मेहरा की सहानुभूति और कोशिशें बढ़ती जा रही थीं। मिसेस मेहरा ने इसे भाँप लिया था। वह पति से तो कुछ कहने का साहस नहीं कर पाई, लेकिन एक दिन तुलसा से उन्होंने अवश्य कहा, "तुलसा, जब साहब नहाकर निकले, तब तू उनके सामने न जाया कर, और हाँ, जब सोए हों तो बेडरूम में झाडू-पोंछे के लिए जाने की जरूरत नहीं है"। सुनकर तुलसा को बहुत बुरा लगा था। लगा जैसे उसे निर्वस्त्र कर दिया गया हो। अपना पाप दूसरों पर डालने की घिनौनी कोशिश लगी थी उसे, पर मजबूर थी। पहले की स्थिति होती तो उसी क्षण काम छोड़ देती। फिर भी उसने निश्चय किया कि पहली तारीख बाद काम छोड़ देगी। इसलिए भी कि उसे यह आशंका थी कि अचानक काम बंद करने से हो सकता है कि अगले दिन से मेहरा मेमसाब आस-पड़ोस में कहती फिरे कि कुलच्छनी थी, साहब पर डोरे डाल रही थी इसलिए मैंने तत्काल निकाल दिया। वही बात, पकड़े जाने पर अपराधी उलटकर हमला करता है। तुलसा की व्यथा-कथा का पता नहीं चलता, यदि कुछ दिनों बाद वह यह गाथा मेरी पत्नी को नहीं सुनाती। तुलसा हमारे यहाँ छः वर्षों से काम कर रही थी। उसने यह भी बताया था जिस दिन यह वाकया हुआ था, घर लौटकर बच्चों से लिपटकर वह बहुत रोई थी। यह केवल एक उदाहरण था। पता नहीं ऐसी कितनी तुलसाएँ अलग-अलग तरह के दंश झेलती रहती हैं और झेलती रहेंगी, अगर समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आया तो। |
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