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दया की मूर्ति :- मदर टेरेसा
सेवा भावना की मिसाल : मदर टेरेसा
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सम्मान :-
मदर टेरेसा के सेवा कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

सन् 1969 में उन्हें 'नोबेल शांति पुरस्कार', 1962 में 'पद्म श्री', 1973 में 'टेम्पलटन पुरस्कार' व 'मैटर सट मैगरेस्ट पुरस्कार', 1976 में 'देशिकोत्तम पुरस्कार', 1980 में 'भारत रत्न', 1983 में ब्रिटेन की महारानी द्वारा 'आर्डर ऑफ मेरिट', 1992 में 'राजीव गाँधी सद्भावना पुरस्कार', 1993 में 'यूनेस्को शांति पुरस्कार' तथा 1997 में 'रैमन मैग्सेसे' सम्मान से नवाजा गया।

सुर्खियों में रही मदर :-
मानवता की सेविका मदर टेरेसा भी आरोपों से अछूती नहीं रहीं। कभी इनकी संस्था के कार्यों में धाँधली के आरोप लगे तो कभी अपनी धार्मिक विचारधारा के कारण यह महिला सुर्खियों में आई।

  चेहरे पर झुर्रियाँ, लगभग पाँच फुट लंबी, गंभीर व्यक्तित्व वाली यह महिला असाधारण सी थी। पैर में साधारण सी चप्पल पहने तथा कंधे पर दवाइयों का झोला टाँगे मदर टेरेसा असाध्य बीमारियों से पीडि़त लोगों को दवाइयाँ देकर उनकी सेवा करती थीं।      
स्वयं को ईश्वर की सेविका मानने वाली मदर टेरेसा स्वयं ईश्वर के अस्तित्व में यकीन नहीं करती थीं। यह तथ्य 'मदर टेरेसा कम, बी माय लाइट' पुस्तक से उजागर होते हैं। जिसमें मदर टेरेसा के कई व्यक्तिगत पत्रों को प्रकाशित किया गया है जो उन्होंने अपने करीबी लोगों को लिखे थे।

पादरी ब्राएन कोलोडाईचुक ने इन पत्रों को एकत्र कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। जिसे पढ़ने पर मदर टेरेसा का एक अलग ही रूप हमारे सामने आता है।

इन पत्रों में कितनी सच्चाई है। इसके बारे में तो हम कुछ कह नहीं सकते। परंतु इस महिला ने दुनिया के समक्ष सेवा कार्य का जो उदाहरण प्रस्तुत किया। वह अद्वितीय है जिसके लिए मदर टेरेसा का नाम सदियों तक याद रखा जाएगा।
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