मैं हैरान रह गई थी। चुपचाप खड़ी होकर मैं यह सोच रही थी कि मेरी मूर्खता के कारण पूरी कंपनी को परेशानी उठाना पड़ेगी। एक कर्मचारी को हमेशा कंपनी की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए, परंतु उफ्, ये मैंने क्या कर दिया? मैं अपनी सीट पर वापस लौट गई थी। मैं इतनी स्तब्ध थी कि मेरी आँखों में आँसू छलक आए थे। मैं एकदम शांत बैठ गई। कुछ देर तक बैठी रही। फिर मैंने एक कागज पर अपना इस्तीफा लिख दिया। मैं इस तरह ही अपनी गलती का प्रायश्चित कर सकती थी। मैंने अपने बॉस के कमरे में जाकर उन्हें अपना त्यागपत्र दे दिया। उनके सामने सिर झुकाकर खड़ी हो गई। | | मैं इतनी स्तब्ध थी कि मेरी आँखों में आँसू छलक आए थे। मैं एकदम शांत बैठ गई। कुछ देर तक बैठी रही। फिर मैंने एक कागज पर अपना इस्तीफा लिख दिया। |
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उन्होंने बड़े ध्यान से त्यागपत्र पढ़ा तथा पढ़ने के बाद फाड़कर फेंक दिया। उन्होंने कहा कि गलती हर किसी से होती है। मैंने उस डिस्क का बैकअप लेकर रख लिया था। तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं, पश्चाताप अपने आप में एक प्रकार की सजा होती है जो कि तुम पहलेही बहुत कर चुकी हो। तुम्हें इतना भावुक नहीं होना चाहिए। जिंदगी में भावुक व्यक्ति बहुत कष्ट उठाते हैं। जाओ और जाकर अपना काम करो। कुछ कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। अब मैं नलिनी की तरफ देख रही थी और उससे कहा- 'चिंता मत करो, मैं प्रोग्राम को वापस लिखूँगी। घर में मेरे पास कुछ प्रोग्राम लिखे हुए हैं।' इस घटना से मैंने यही सीखा है कि जब एक व्यक्ति संस्था प्रमुख बन जाता है, तब उसे अपने अधीनस्थों को माफ कर देना चाहिए। अपने बॉस के भय से उसके साथ आपके संबंध अच्छे नहीं हो सकते हैं। प्यार, अपनेपन की भावना तथा गुणों की प्रशंसा से ही अच्छे संबंध बन सकते हैं। हम अपना ज्यादा से ज्यादा समय काम करने में व्यतीत करते हैं। यह समय खुशी से बिताना चाहिए, न कि एक-दूसरे पर इल्जाम लगाकर। |
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