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राम को रास आई कहानी
- सुधा मूर्ति

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पिछले अंक से जारी...
पेट्रोल पंप के राम और गोपाल को लेखिका कहानी सुनाने जाती थी। कुछ साल बाद युवा राम से मुलाकात कुछ यूँ हुई पढ़िए -

मैंने क्षमा माँगते हुए कहा कि मैं उसका नाम नहीं याद कर पा रही हूँ। 'क्या तुम अपना नाम बता सकते हो?' वह मुस्करा दिया, उसके डिम्पल को देखकर मैंने उसे पहचान लिया। यह उन्हीं जुड़वा लड़कों में से एक था, परंतु वह राम था या गोपाल, यह मैं समझ नहीं पा रही थी।

  मुझे याद नहीं था। कहानियों के सागर में से शायद कुछ कहानी उन्हें सुनाई थी। इतने साल बीत गए थे कि मुझे याद नहीं आ रहा था कि मैंने उन्हें कौन-सी कहानियाँ सुनाई थीं। उसने बताया- हमारा जीवन संघर्षपूर्ण था। यह बात आप जानती थीं।      
मैंने पूछा- 'तुम्हारा नाम गोपाल है या राम?' तब लड़के ने कहा- 'मैडम मेरा नाम राम है।' मैंने कहा कि मुझे तुम्हें इस तरह देखकर बहुत खुशी हुई। अब मुझे समझ में आ गया था कि राम क्यों मेरे बारे में पूछ रहा था। दरअसल वह मेरी गाड़ी को पहचान गया था।

मैडम, मैं हमेशा आपका आभारी रहूँगा कि आपने उस वक्त हमारी मदद की थी, जब हमारे पास कुछ भी नहीं था। मैंने कहा- 'क्या सहायता की तुम्हारी?' मैं तो बस कहानियाँ सुनाती, कभी पुराने कपड़े देती और कभी खाने की वस्तुएँ। वह बोला- 'मैडम, आप नहीं जानती कि कैसे उन कहानियों ने मेरे जीवन को परिवर्तित कर दिया। क्या आपकों याद हैं वे कहानियाँ, जो आपने हमें सुनाई थीं?'

मुझे याद नहीं था। कहानियों के सागर में से शायद कुछ कहानी उन्हें सुनाई थी। इतने साल बीत गए थे कि मुझे याद नहीं आ रहा था कि मैंने उन्हें कौन-सी कहानियाँ सुनाई थीं। उसने बताया- हमारा जीवन संघर्षपूर्ण था। यह बात आप जानती थीं। हमें सिर्फ आपकी सुनाई गई कहानियों से राहत मिलती थी। हम अपने मामा के साथ रहते थे। वे हमारी सारी कमाई लेते थे।

हमारा काम लंबे समय तक चलता रहा। हमें लगा कि स्कूल जाकर पढ़ाई पूरी करना चाहिए। जहाँ पर हम रहा करते थे वहाँ से स्कूल बहुत दूर था। घर से हमें कभी आर्थिक सहायता नहीं मिलती थी और पढ़ पाना हमें स्वप्न-सा लगता था। आपकी सुनाई गई कहानियाँ हमारे दुःख भरे जीवन में उजाले के समान थीं।
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