- सुधा मूर्ति कुछ साल पहले की बात है। गाड़ी चलाने के लिए मेरे पास वाहन चालक नहीं था। कहीं भी जाना होता था तो मैं स्वयं गाड़ी चलाकर जाती थी। पेट्रोल स्टेशन के पास सर्विस स्टेशन भी था। शनिवार के दिन गाड़ी को सर्विस करवाने के लिए वहाँ ले जाती थी। वहाँ काफी समय तक ठहरती भी थी। सर्विस स्टेशन पर मैंने दो लड़कों को काम करते हुए देखा था। वे 14 साल के जुड़वा लड़के थे। एक लड़के का नाम था राम और दूसरे का गोपाल। दोनों लड़के बहुत गरीब घर से ताल्लुक रखते थे। इसलिए वे स्कूल भी नहीं जा सके थे। | | कम उम्र में ही पिता का देहांत हो गया था। अकेली माँ अपने जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का काम करके सबका भरण-पोषण करती थी। पास ही गाँव में दोनों लड़के मामा के साथ रहते थे। कक्षा चार तक उन्होंने पढ़ाई की थी। वे गरीब थे, इसलिए अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। |
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बेंगलुरू में केवल कन्नड़ भाषा ही नहीं बोली जाती, बल्कि राज्य के अन्य भाग के विभिन्न भाषाओं के लोग बेंगलुरू में रहने लगे हैं। फलस्वरूप यहाँ के लोग मिश्रित भाषा बोलते हैं। इसका प्रभाव दोनों लड़कों पर भी पड़ा। कई तरह के लोगों के साथ उनकी मुलाकात होती थी। इसलिए वे कन्नड़ भाषा के साथ-साथ तमिल, तेलुगु एवं हिन्दी भाषा भी बोलने लगे थे। राम एवं गोपाल मुस्कराते रहते। गाड़ी की सर्विसिंग में अक्सर समय लगता था। मुझे खड़ा देखकर वे मेरे लिए कुर्सी लाकर बैठने के लिए कहते। जब तक गाड़ी सर्विस होकर नहीं आती थी तब तक मैं पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ती थी। समय के साथ-साथ मेरी दोस्ती उन लड़कों के साथ हो गई। धीरे-धीरे उन्होंने मुझे अपने संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी सुनाई। कम उम्र में ही पिता का देहांत हो गया था। अकेली माँ अपने जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का काम करके सबका भरण-पोषण करती थी। पास ही गाँव में दोनों लड़के मामा के साथ रहते थे। कक्षा चार तक उन्होंने पढ़ाई की थी। वे गरीब थे, इसलिए अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। पढ़ने की जिज्ञासा थी, किंतु घर पर कोई भी नहीं था, जो पढ़ाई के लिए उनका सही मार्गदर्शन कर सके। सर्विस स्टेशन पर आय ज्यादा नहीं थी। उन्हें नाश्ता एवं दोपहर का भोजन निःशुल्क मिलता था। उनका कार्य प्रातःकाल 8 बजे शुरू होता था और रात के 8 बजे तक चलता रहता था। रविवार के दिन ही उन्हें छुट्टी मिलती थी। मुश्किलों में भी वे दोनों हमेशा हँसते रहते थे। वे दूसरों के सामने अपनी तकलीफ बयान नहीं करते थे। यदि उन्हें कार्य करने के लिए कहे तो वे उसे नहीं करने के लाखों बहाने बनाते। खुशियाँ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आपका बैंक बैलेंस कितना है, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करती हैं। |
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