पिता ने कहा कि तुम्हारे अध्यापक बहुत ही अच्छे व्यक्ति हैं। तुमने ही उन्हें परेशान किया होगा। उन्होंने तुम्हें एक शिक्षा दी है। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ। मैं उन्हें कल सब बात समझा दूँगा। मत जाओ आज रात को। वे समझ जाएँगे और तुम्हें माफ कर देंगे। तुम उनकी बेटी के समान हो। रत्नप्रभा ने उनकी बात नहीं सुनी। वह जिद करने लगी कि वह वहाँ पर अकेली जाएगी। बहुत-से जंगली जानवर जंगल में मिले, परंतु वह निडर होकर आगे चलने लगी।
| | यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम चीजों का किस प्रकार आकलन करते हैं। जब भी कोई समस्या उठती है तो हमें उसे अलग-अलग दृष्टिकोण से देखना चाहिए। हो सकता है, हम सब अलग-अलग निर्णय पर पहुँचें। |
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अचानक राह में एक चोर ने रत्नप्रभा को रोक लिया। चोर ने इतने सारे कीमती गहने पहले कभी नहीं देखे। वह बहुत खुश हुआ यह सोचकर कि इन गहनों को बेचकर उसे बहुत-सा धन मिल जाएगा। रत्नप्रभा निडर रही। उसने कहा- मैंने अपने अध्यापक से वादा किया है कि मैं उनके घर गहने पहनकर जाऊँगी। जब मैं वापस लौटकर आऊँगी, तब मैं सब गहने तुम्हें दे दूँगी।
वह चोर चकित होकर उसकी राह से हट गया, परंतु उसका पीछा करने लगा यह जानने के लिए कि आगे क्या होगा। रत्नप्रभा अध्यापक के घर पहुँची। अध्यापक ने जब दरवाजा खोला तो उन्हें आश्चर्य के साथ दुख भी हुआ। शिक्षक ने कहा कि मैंने सोचा कि तुम इसे एक मजाक समझोगी।
मैंने तुम्हें हतोत्साहित करने के लिए ऐसा कहा था। मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि तुम सब कठिनाइयों को पार करके मेरे द्वार तक पहुँच जाओगी। बेटी, अब तुम घर वापस चली जाओ। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।
जब रत्नप्रभा घर की ओर वापस लौटने लगी, तब चोर ने फिर उसका रास्ता रोक दिया। उसने कहा कि तुमने वादा किया था कि मुझे सारे गहने दे दोगी। जब वह युवती उस चोर को गहने देने लगी तो चोर ने मुस्कराकर कहा कि तुम एक असाधारण युवती हो। मुझे तुमसे कुछ भी नहीं चाहिए। ऐसे लोग बहुत कम देखने को मिलते हैं।
रत्नप्रभा घर लौट आई। उसके पिताजी घर के द्वार पर उसका इंतजार कर रहे थे। पिता से उसने सारी बात कही। सुनकर उसके पिताजी बहुत प्रसन्न एवं गर्वित हो उठे। उन्होंने कहा- तुम साहसी हो एवं तुमने अपना वादा पूरा किया। अब तुम आराम करो, आज तुमने बहुत अधिक सफर किया है। |