- सुधा मूर्ति अक्सर, कक्षा में पढ़ाने के बाद मैं कहानी सुनाती थी, जिसे सुनकर बहस प्रारंभ हो जाती थी। एक बार मैंने व्याख्यान में कहा कि कई बार ऐसा होता है कि हमारे सामने समस्या का कोई सही समाधान नहीं होता है। दरअसल, यह मात्र हमारे देखने के नजरिए पर निर्भर करता है।
हम दूसरों के बारे में टिप्पणी करते हैं, वह हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, परंतु विद्यार्थियों ने मेरी बात को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा- हमें अच्छे से समझाइए।
| | अमावस्या की रात आई। रत्नप्रभा गहनों से अपना श्रृंगार कर घर के बाहर कदम रख ही रही थी कि पिता ने पूछा- कहाँ जा रही हो? रत्नप्रभा ने पिता को पूरी बात बता दी। पिता उसकी बातों को सुनकर दंग रह गए। |
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मैंने कहा- मैं सभी को एक कहानी सुनाती हूँ। कई सदी पहले की बात है। रत्नप्रभा एक बहुत ही सुंदर, धनी एवं चतुर युवती थी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी कर अपने अध्यापकों से पूछा कि मुझे आपको गुरुदक्षिणा के तौर पर कितना भुगतान करना होगा? अध्यापक ने कहा कि तुम्हें मुझे कुछ नहीं देना होगा। तुम्हारे पिताजी ने पढ़ाई का खर्च चुका दिया है, तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।
रत्नप्रभा फिर से जिद करने लगी। अध्यापक परेशान हो गए। उन्होंने सोचा था कि मुझे इस लड़की की परीक्षा लेना चाहिए। मैं इसे एक ऐसी स्थिति में डालूँगा, ताकि वह मुझे गुरुदक्षिणा के लिए फिर परेशान नहीं करे।
तब अध्यापक ने कहा- रत्नप्रभा, तुम अमावस्या की रात को गहनों से श्रृंगार करके मेरे घर आना। रत्नप्रभा एवं अध्यापक के घर के बीच एक जंगल था। मार्ग बहुत ही खराब था। जंगल एवं नदी में बहुत-से जानवर थे। रत्नप्रभा थोड़ी देर तक सोचने के बाद वहाँ से चली गई। अध्यापक बहुत खुश हुए कि उन्होंने अपने विद्यार्थी को बिना कुछ किए खामोश कर दिया था।
अमावस्या की रात आई। रत्नप्रभा गहनों से अपना श्रृंगार कर घर के बाहर कदम रख ही रही थी कि पिता ने पूछा- कहाँ जा रही हो? रत्नप्रभा ने पिता को पूरी बात बता दी। पिता उसकी बातों को सुनकर दंग रह गए।
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