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'रेनी डे' के लिए!
मेरे पति ने शायद मेरे मन को पढ़ लिया था। 'यह व्यापार नए तरह का है, जो कि बौद्धिक शक्ति से चलेगा एवं इसमें ज्यादा धन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।' उन्होंने मुझसे कहा- 'मुझे तुम्हारा सहयोग चाहिए।' उनकी आवाज में निष्पक्षता एवं ईमानदारी थी जिसका मैं आदर करती थी।

मैं सोच-विचार में डूबी हुई थी कि इतने में रोटी जलने की गंध आई। मैं वहाँ बैठकर इस समस्या के परिणाम के बारे में सोच रही थी। मूर्ति का बहुत बड़ा परिवार था, जो उन पर आश्रित था। उनकी तीन अविवाहित बहनें थीं। इस स्थिति में यदि उन्होंने एक नई कंपनी खोलने का प्रयास किया, तब परिवार की आर्थिक स्थिति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा। मैं बहुत चिंतित थी, परंतु उन पर पूरा भरोसा था। मुझे लगा कि जब तक मैं उनका साथ न दूँ, तक तक वे इस कार्य को करने में असहज महसूस करेंगे।

व्यापार में हानि एवं लाभ होता रहता है। व्यापार में हानि होने से सालों से बचाकर रखा धन बर्बाद हो जाएगा, मैंने सोचा। परंतु जब मैं इस सोच में डूबी थी, तब मेरी आत्मा ने मुझसे कहा कि इस स्थिति में भी हम जीवित रहेंगे। मैंने उनसे पूछा- 'क्या आप इस व्यापार में अकेले हैं?'

मूर्ति ने मुस्कराकर कहा- 'नहीं। मेरे साथ छः नवयुवक काम करेंगे। यही एक समय है कि हम नैतिक एवं न्यायोचित रूप से कमा सकते हैं। मेरा एक स्वप्न है कि भारत इस क्षेत्र में अग्रणी बने जिससे इस देश को गौरव प्राप्त हो एवं मुनाफा मिले। तुम्हें ही मुझे सहारा देना होगा। क्या तुम मुझे कुछ पैसे दे सकती हो। यदि तुम मेरी सहायता नहीं करोगी तो मेरा स्वप्न अधूरा रह जाएगा।'

मैं जानती थी कि यदि मैंने उन्हें पैसे नहीं दिए तो वे निजी कंपनी नहीं खोल पाएँगे। उसी क्षण मुझे मेरी माँ की बात याद आई कि हमेशा कुछ पैसे बचाकर रखना और उसे बहुत ही महत्वपूर्ण स्थिति में प्रयोग करना। यह वही स्थिति थी अतः मैंने फैसला किया और रसोई में रखे अपनी बचत के पैसों का बॉक्स उठाया। जिसमें मैं हर महीने पैसे रखती थी। मैंने उनकी गिनती की। उस बक्से में दस हजार रुपए रखे हुए थे। मैंने मूर्ति को वे पैसे दे दिए।

मैंने कहा- 'ऑल द बेस्ट मूर्ति, मेरे पास बस यही है, आपको देने के लिए। मैं खुशी-खुशी हर दायित्व लेने के लिए तैयार हूँ, परंतु इस कंपनी का नाम क्या रखेंगे?'

उन्होंने कहा- 'इंफोसिस। तुम्हारे साथ के लिए और इन पैसों के लिए धन्यवाद। कुछ सालों के लिए जीवन के ऊँचे-नीचे पड़ाव के लिए तैयार रहना।'

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि हमारे जीवन की राह कैसे बदल गई, क्योंकि मैंने माँ के समझाए अमूल्य वचन पर अमल किया था। मैं अक्सर यह कहानी अपने बच्चों एवं विद्यार्थियों को सुनाती थी। कोई नहीं जानता कि कब 'रेनी डे' आ जाए औरबचत के पैसों की जरूरत महसूस हो। अगर वह दिन आया तो माँ की बात सच निकलेगी। माँ की शिक्षा हमेशा अनमोल होती है।
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